18वां ब्रिक्स समिट 2026 भारत की अध्यक्षता में भारत मंडपम नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को आयोजित हुआ. 19वां ब्रिक्स समिट साल 2027 में चीन में होगा और इसका ऐलान खुद चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने किया, जिससे सदस्य देशों ने सहमति जताई. ब्रिक्स समिट को जॉइन करने के लिए रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग दल-बल के साथ भारत पहुंचे. ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों और पार्टनर देशों के साथ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने 2 दिन में 15 द्विपक्षीय वार्ता की और ब्रिक्स समिट के जरिए 2 महाशक्तियों समेत 11 राष्ट्राध्यक्षों को एक मंच पर आकर दुनिया को संदेश दिया कि चाहे कुछ हो जाए, ब्रिक्स देश मिलकर किसी भी वैश्विक संकट का सामना कर सकते हैं. आइए जानते हैं कि भारत के लिए ब्रिक्स समिट 2026 कूटनीतिक जीत कैसे और क्यों बना?
वैश्विक संकट, व्यापारिक अस्थिरता के बीच एकजुटता दिखी
अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफरी सैक्स ने भारत में हुए 18वें ब्रिक्स समिट को सफल बताया. उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देश वैश्विक मंच पर अपनी पहचान कायम रखने में कामयाब हुए, क्योंकि भारत के कारण 2 दिन एक जगह पर 11 देशों की गतिविधियों पर पूरी दुनिया की नजर रही. भारत ने वैश्विक संकट, व्यापारिक अस्थिरता, तीसरे और परमाणु युद्ध की आशंकाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और विवादों को कूटनीति से सुलझाने की विचारधार पर आम सहमति बनाने में कामयाबी हासिल की. आतंकियों और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वैश्विक समर्थन भारत को मिला तो भारत ने सुधारों की मांग करके ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी विरोधी बनने से रोका. ब्रिक्स समिट में असली परीक्षा यह थी कि क्या मिडिल ईस्ट में युद्ध और मतभेदों से ग्रस्त गुट एक मंच पर आ सकता है या नहीं.
ब्रिक्स समिट ईरान-यूएई के बीच बैठक का मंच बना
भारत में हुए ब्रिक्स समिट में हिस्सा लेने ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भी आए, जिन्हें भारत की मध्यस्थता में आमने-सामने बातचीत करने का मौका मिला. क्योंकि UAE को पिछले 6 महीने ईरान के चलते बिना किसी कारण दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है. एक और अमेरिका से जंग के कारण ईरान लगातार UAE में अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला करके नुकसान पहुंचा रहा है. दूसरी ओर, लाल सागर में यमन के हूती विद्रोही हमले करके UAE की पाइपलाइन और मिलिट्री बेस, क्रूड ऑयल प्लांट को नुकसान पहुंचा रहे हैं. ईरान और संयुक्त अरब अमीरात मतभेदों के साथ ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल हुए. मई में दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के खत्म हुई थी, क्योंकि मध्य पूर्व को लेकर मतभेदों के कारण आम सहमति नहीं बन पाई.
ईरान की मांग अमेरिका-इजरायल युद्ध पर और कड़े रुख की थी, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने आपत्ति जताई. इसलिए ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन और विदेश नीति के उपाध्यक्ष हर्ष वी पंत ने चेतावनी दी थी कि ईरान और यूएई के बीच तनाव ब्रिक्स समिट के जॉइंट स्टेटमेंट को रोक सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि भारत में आमने-सामने बातचीत करने के बाद दोनों देशों ने ब्रिक्स समिट के उस जॉइंट स्टेटमेंट पर साइन किए, जिसमें दोनों देशों से मध्य पूर्व में संयम बरतने का आग्रह किया गया था. इसके बाद ब्रिक्स समिट में ईरानी राष्ट्रपति ने क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद से मुलाकात की. इसलिए भारत की कूटनीतिक जीत ईरान और यूएई के बीच तनाव को ब्रिक्स के जॉइन स्टेटमेंट की राह का बाधा बनने और ईरान-UAE को बातचीत का मंच देने में कामयाब रहा.
दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति ब्रिक्स देशों में सहमति
ब्रिक्स समिट से पहले विदेश नीति विशेषज्ञ हर्ष वी पंत ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे, क्योंकि अप्रैल 2025 में रियो डी जनेरियो में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में जॉइंट स्टेटमेंट जारी नहीं हुई थी. तब ब्रिक्स के अध्यक्ष रहे ब्राजील ने अध्यक्षीय बयान जारी किया. इसलिए सवाल उठा रहा था कि अप्रैल 2025 और मई 2026 ब्रिक्स देश जॉइंट स्टेटमेंट जारी नहीं कर पाए, क्योंकि सहमति नहीं बनी थी तो क्या ब्रिक्स समिट में भी ऐसा होगा? और भारत ऐसा करने में सफल रहा. ब्रिक्स समिट के जॉइंट स्टेटमेंट पर भारत सभी 11 सदस्य देशों की सहमति हासिल करने में कामयाब हुआ.
वैश्विक संकट, व्यापारिक अस्थिरता, डिजिटलाइजेशन, AI, आतंकवाद, युद्धों समेत कई मुद्दों का जिक्र था, जिनका ब्रिक्स देशों ने समर्थन किया. घोषणा पत्र में भारत की ब्रिक्स समिट की अध्यक्षता को भी सराहा गया और सम्मेलन के सफल संचालन के लिए आभार जताया गया. समिट का जॉइंट स्टेटमेंट एक ऑफिशियल स्टेटमेंट है, जिसमें कही गई बातें और दिए गए बयान सालभर लागू रहेंगे, ऐसे में अगर ब्रिक्स संगठन के सदस्य देश मुद्दों पर सहमति नहीं बनाएंगे तो इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे, लेकिन भारत ने जॉइंट स्टेटमेंट के मुद्दों पर सदस्य देशों को सहमत करके साबित किया कि ब्रिक्स देश सहमति से काम करते हैं. आपसी मतभेदों को दरकिनार करके ब्रिक्स की प्रासंगिकता बनाए रखते हैं.
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में 11 देशों का समर्थन
ब्रिक्स समिट में भारत के लिए बड़ी सफलता, पहलगाम आतंकी हमले की निंदा और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ब्रिक्स देशों का समर्थन मिलना था. नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों ने अप्रैल 2026 में भारत के जम्मू और कश्मीर में पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की है, जिसमें 26 लोग मारे गए थे. इसमें आतंकवादियों की सीमा पार से घुसपैठ, आतंकवाद को फंडिंग और पनाह देने समेत आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के साथ मिलकर लड़ने के संकल्प और प्रतिबद्धता को दोहराया गया. आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी अपनाते हुए आह्वान किया गया कि सभी ब्रिक्स देश एकजुट होकर आतंकवाद विरोधी उपाय करेंगे.
चीन, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और ताइवान की विशेषज्ञ सना हाशमी ने X पर लिखा कि घोषणा पत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया. लेकिन इसमें पहलगाम आतंकी हमले का विशेष जिक्र किया गया. इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकवादी गतिविधियों में शामिल सभी लोगों और समर्थकों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए. पहलगाम को केवल भारत-पाकिस्तान का मुद्दा बताने की बजाय पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का संकल्प लिया गया.
भारत ने ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी गुट नहीं बनने दिया
ब्रिक्स समिट में भारत की एक उपलब्धि यह थी कि भारत ने ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की मांग और टैरिफ पॉलिसी का विरोध जताया, लेकिन ब्रिक्स को पूरी तरह से अमेरिका विरोधी गुट नहीं बनने दिया. भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता करके विकासशील देशों की चिंताओं को उजागर किया, लेकिन उसने ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी या पश्चिमी विरोधी गठबंधन में नहीं बदला. दिल्ली घोषणा पत्र में ब्रिक्स देशों ने वैश्विक व्यवस्था में सुधार, उभरते बाजारों एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग की. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों का समर्थन किया गया है.
कहा गया है कि चीन और रूस, संयुक्त राष्ट्र विशेष रूप से सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील के ज्यादा प्रतिनिधित्व का समर्थन करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में विकासशील देशों के लिए ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग की गई है. एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना भी की गई. रूस पर यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगाए, क्योंकि वह यूक्रेन को नाटो का मेंबर बनने से रोकने के लिए युद्ध लड़ रहा है. रूस और चीन दोनों ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी गुट में बदलने के लिए एकतरफा दबाव डालते हैं. पूर्व राजनयिक वीना सिकरी ने ब्रिक्स में भारत की स्थिति को पश्चिम विरोधी की बजाय गैर-पश्चिम बताया और कहा कि हम पश्चिम-विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक विश्व के रूप में रहना चाहते हैं.
ब्रिक्स देशों को युद्धों और प्रतिबंधों के संकट से उबारा
भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स समिट में सभी ब्रिक्स देश गाजा-इजरायल, ईरान-अमेरिका, रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान कूटनीति से निकालने के विचार पर सहमत हुए. 2026 का ब्रिक्स अपने बेसिक 5 सदस्यों वाला ब्रिक्स नहीं है. बल्कि इसका विस्तार हो चुका है और आज 11 देश इसके सदस्य हैं. लेकिन इस साल चुनौती ज्यादा गंभीर हो गई, क्योंकि 2 सदस्य देश युद्धों में उलझे हुए थे. रूस यूक्रेन के साथ युद्ध कर रहा है, जबकि ईरान अमेरिका और इजरायल के साथ संघर्षरत है. इन युद्धों के परिणाम पूरी दुनिया को झेलने पड़े हैं, क्योंकि युद्धों का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों, समुद्री परिवहन, सप्लाई चेन, खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति पर पड़ा.
फिर भी घोषणा पत्र इन संकटों में संतुलन कायम करने में कामयाब रहा. पश्चिम एशिया के मुद्दे पर ब्रिक्स देशों की स्थिति को समझते हुए हुए संयम बरतने और कूटनीति अपनाने का आह्वान किया. अंतरराष्ट्रीय विवादों पर संवाद, परामर्श और कूटनीति का समर्थन किया. आर्थिक मुद्दों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया. महाशक्तियों के बीच टकराव की होड़ ने ब्रिक्स देशों को अलग करने की धमकी दी, तब भारत ने आम सहमति तक पहुंचने और ग्लोबल साउथ के लिए एकजुट होने में कामयाबी हासिल की. मतभेदों के बावजूद ब्रिक्स देश कार्यशील बने रह सकते हैं, ब्रिक्स समिट में भारत ने यह साबित कर दिखाया.
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