अभी ईरान-अमेरिका के बीच शांति समझौता हुआ ही है कि एक और नया संकट दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. अभी होर्मुज स्ट्रेट के आस-पास तनाव कम होने से लोगों में स्थिरता की उम्मीद जगी ही थी कि तभी समुद्री व्यापार के एक और अहम रास्ते पर खतरा मंडराने लगा है, जिसका कारण कोई युद्ध नहीं बल्कि अल-नीनो है.
प्रशांत महासागर में अल-नीनो की वापसी से पनामा नहर में कामकाज पर फिर से खतरा मंडरा सकता है, जो दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक रास्तों में से एक है. अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने आधिकारिक तौर पर कह दिया है कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में अल नीनो की स्थिति बन गई है और चेतावनी दी है कि 2026 के आखिर तक यह मौसमी घटना अब तक की सबसे ताकतवर घटनाओं में से एक बन सकती है.
NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के अनुसार, इस बात की 88 प्रतिशत संभावना है कि नवंबर और जनवरी के बीच ‘अल-नीनो’ मजबूत तीव्रता तक पहुंच जाएगा और 63 प्रतिशत संभावना इस बात की भी है कि यह बहुत ज्यादा मजबूत हो सकता है. अगर ऐसा होता है तो यह घटना 1997-98 और 2015-16 की ऐतिहासिक ‘अल नीनो’ घटनाओं के बराबर होगी. इन दोनों ही घटनाओं का दुनियाभर के मौसम और व्यापार नेटवर्क पर गहरा असर पड़ा था. शिपिंग इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चिंता पनामा नहर है.
क्या पनामा नहर पर मंडरा रहा खतरा?
2023-24 के अल नीनो की वजह से नहर के इतिहास में सबसे बुरे सूखे में से एक की स्थिति पैदा हुई थी. गैटुन झील में पानी का स्तर तेजी से गिर गया था. यह झील नहर के लॉक सिस्टम को चलाने के लिए जरूरी मीठा पानी सप्लाई करती है.
इसके जवाब में, पनामा नहर अथॉरिटी ने गुजरने वाले जहाजों की संख्या कम कर दी और ड्राफ्ट (पानी में जहाज की गहराई) से जुड़ी पाबंदियां लगा दीं. इससे ट्रैफिक सामान्य स्तर से 40 प्रतिशत तक कम हो गया. इस रुकावट का असर दुनिया भर की सप्लाई चेन पर पड़ा. जहाजों को कई दिनों तक लाइन में इंतजार करना पड़ा या फिर दक्षिण अमेरिका के रास्ते या स्वेज नहर से होते हुए लंबे और महंगे सफर पर जाना पड़ा.
हालांकि सूखा कम होने के बाद कामकाज धीरे-धीरे सामान्य हो गया, लेकिन कैनल अथॉरिटी पहले से ही एक और मुश्किल दौर के लिए तैयारी कर रही है. पनामा नहर अथॉरिटी ने घोषणा की है कि ‘अल नीनो’ के बनने की संभावना को देखते हुए, 3 जुलाई से नियो-पनामैक्स (Neopanamax) जहाजों के लिए अधिकतम अधिकृत ड्राफ्ट (पानी में जहाज की गहराई) को घटाकर 49.5 फीट कर दिया जाएगा.
नहर से गुजरने वाले जहाजों की मांग लगातार बढ़ रही है और दूसरी ओर एक नई चिंता सामने खड़ी हुई है. क्लार्क्सन्स रिसर्च के एनालिस्ट का कहना है कि अमेरिका से ऊर्जा का रिकॉर्ड निर्यात उपलब्ध स्लॉट पर दबाव बढ़ा रहा है. अप्रैल और मई में प्रोडक्ट टैंकरों के आवागमन ने रिकॉर्ड स्तर को छुआ, जबकि लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और इथेन के बढ़ते निर्यात ने नहर से गुजरने के लिए प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है.
अल-नीनो का असर सिर्फ पनामा तक सीमित नहीं
अल-नीनो का असर सिर्फ पनामा शहर तक ही सीमित नहीं है. यह घटना प्रशांत क्षेत्र में हवा के बहाव के पैटर्न को बदल देती है, जिससे अक्सर मध्य अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में बारिश कम हो जाती है. इससे नदी परिवहन नेटवर्क, अंदरूनी जलमार्ग और नहरों पर निर्भर लॉजिस्टिक्स सिस्टम पर असर पड़ सकता है, जो मौसमी बारिश और मॉनसून से मिलने वाले पानी के स्रोतों पर निर्भर होते हैं.
क्या भारत पर भी पड़ेगा असर?
जी हां, भारत पर भी इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. अल नीनो मॉनसून की बारिश, खेती के उत्पादन और सामान की आवाजाही पर असर डालता है. भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बारिश के पैटर्न में बदलाव से अनाज, सोयाबीन और खेती से जुड़े सामान के निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिससे ड्राई बल्क कैरियर और ग्लोबल फ्रेट मार्केट में मांग बदल सकती है.
क्या है पनामा कैनाल, यह कितनी अहम है
- पनामा नहर 51 मील यानी करीब 82 किलोमीटर लंबी है, जो मध्य अमेरिका के बीचों-बीच बहती है. यह प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर को जोड़ने वाली मुख्य नहर है.
- हर साल लगभग 14,000 जहाज इस नहर को एक शॉर्टकट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. इस नहर के बनने से पहले उन जहाजों को दक्षिण अमेरिका से होते हुए लंबा और महंगा सफर तय करना पड़ता था.
- पनामा नहर को पहली बार 1914 में खोला गया था. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स में से एक है. यहां से पूरी दुनिया का करीब 5 फीसदी समुद्री कारोबार होता है. इसके बंदरगाहों पर कब्जे का मतलब है, क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ बनाना और खूब कमाई करना.
- पनामा दुनिया में जहाज रजिस्ट्रेशन का एक बड़ा केंद्र है और इससे उसे हर साल करीब 100 मिलियन डॉलर की कमाई होती है.
भारत के लिए भी पनामा बेहद अहम रास्ता
- पनामा नहर भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है. भारत अमेरिका और प्रशांत क्षेत्रीय देशों के साथ व्यापार के लिए इस नहर का इस्तेमाल करता है.
- इस नहर से सालना 13,000 से 14,000 जहाज गुजरते हैं. इनमें से कई भारतीय झंडे वाले या भारतीय कार्गो ले जाने वाले जहाज होते हैं, जो वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख हिस्सा है.
- पनामा नहर से भारत अपने अमेरिका जाने वाले जहाजों को भेजता है. इससे यह केप हॉर्न का चक्कर लगाने से बच जाता है. ऐसा नहीं करने पर भारतीय जहाजों को 13,000 किमी से अधिक की दूरी और तय करनी होगी. इससे माल की लागत बढ़ जाती है.
- पनामा अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारतीय उद्यमों के लिए एक प्रमुख लॉजिस्टिक्स हब बन रहा है. पनामा में 15,000 से अधिक भारतीय रहते हैं.
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