Dosa King: दक्षिण भारतीय खाने का जिक्र होते ही सरवणा भवन का नाम अपने आप जुबान पर आ जाता है। इस मशहूर रेस्तरां चेन के पीछे एक ऐसा शख्स था, जिसने जीरो से शुरुआत कर 3,000 करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया। “डोसा किंग” के नाम से मशहूर पिचाई राजगोपाल ने अपनी कड़ी मेहनत और अनोखे बिजनेस मॉडल से दुनिया भर में सरवणा भवन को फैलाया। लेकिन सफलता की इस चमक के पीछे एक काली कहानी छिपी थी। ज्योतिष पर अंधविश्वास और जुनून ने उन्हें अपराध की राह पर डाल दिया। एक समय के सफल कारोबारी का अंत जेल में हुआ।
दक्षिण भारत का सबसे मशहूर रेस्तरां
दक्षिण भारतीय खाने की पहचान बन चुके सरवणा भवन के संस्थापक पिचाई राजगोपाल की कहानी सफलता, संघर्ष और अपराध का अनोखा मिश्रण है। एक प्याज बेचने वाले के बेटे के रूप में जन्मे राजगोपाल ने 1981 में चेन्नई में पहला सरवणा भवन रेस्तरां खोला। उन्हें एक ज्योतिषी ने सलाह दी थी कि “आग से जुड़ा कारोबार करो।” शुरुआत में नुकसान झेलने के बावजूद, उन्होंने अपने रेस्तरां में बेहतरीन क्वालिटी बनाए रखी और धीरे-धीरे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। कम कीमत में शुद्ध और स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय भोजन परोसने की उनकी नीति ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया। उनकी मेहनत और समर्पण ने सरवणा भवन को दुनिया भर में प्रसिद्ध बना दिया और 2019 तक यह 22 देशों में 111 रेस्तरां तक फैल गया।
कर्मचारियों के लिए बड़े भाई बने राजगोपाल
सरवणा भवन को खास बनाने में सिर्फ उसका खाना ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के लिए राजगोपाल की सोच भी अहम रही। उन्होंने अपने कर्मचारियों को पेंशन, मुफ्त इलाज, घर बनाने के लिए कर्ज और बेटियों की शादी के लिए आर्थिक मदद जैसी सुविधाएं दीं। इससे उनके कर्मचारी उन्हें “अन्नाची” (बड़े भाई) कहकर सम्मान देने लगे। उनके रेस्तरां की सजावट में भगवान मुरुगन की तस्वीरें और पारंपरिक दीये हमेशा दिखाई देते थे। उन्होंने कई मंदिरों, खासकर भगवान मुरुगन के मंदिरों में बड़े दान दिए। उनके समर्पण और अनोखी कारोबारी रणनीति ने सरवणा भवन को एक प्रतिष्ठित ब्रांड बना दिया।
ज्योतिष पर विश्वास बना विनाश की वजह
लेकिन उनकी सफलता की कहानी एक त्रासदी में बदल गई। ज्योतिष में अत्यधिक विश्वास के चलते उन्होंने अपनी किस्मत संवारने के लिए अपने असिस्टेंट मैनेजर की बेटी, जीवाज्योति से शादी करने का फैसला किया, जबकि वह पहले ही प्रिंस संथाकुमार नामक युवक से शादी कर चुकी थी। जब जीवाज्योति ने राजगोपाल का प्रस्ताव ठुकराया, तो उन्होंने उसे और उसके पति को धमकाना शुरू कर दिया। अक्टूबर 2001 में संथाकुमार का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों बाद, उसका शव कोडाइकनाल के जंगलों में मिला। जांच में पता चला कि उसकी गला दबाकर हत्या की गई थी।
जेल की सजा और दुखद अंत
इस अपराध के चलते राजगोपाल को 2004 में 10 साल की सजा सुनाई गई, लेकिन बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी सजा को बरकरार रखा और उन्हें जेल भेज दिया गया। अपनी सजा काटने के दौरान ही उनकी तबीयत बिगड़ गई और जुलाई 2019 में उनकी मौत हो गई। राजगोपाल की जिंदगी की इस अनोखी दास्तान पर अब निर्देशक टीजे ज्ञानवेल एक फिल्म “डोसा किंग” बना रहे हैं, जिससे यह कहानी एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
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