नोएडा के सेक्टर 150 में 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत ने सरकारी सिस्टम और जमीन के रिकॉर्ड की पोल खोल दी है. ताज्जुब की बात यह है कि जिस जानलेवा गड्ढे में गिरकर युवराज की जान गई, नोएडा प्राधिकरण को यह तक नहीं पता कि उस जमीन का असली मालिक कौन है. रिपोर्ट के मुताबिक, दस्तावेजों से पता चला है कि यह जमीन मूल रूप से 'लोटस ग्रीन्स' को अलॉट की गई थी, जिसे बाद में कई बिल्डरों को छोटे-छोटे हिस्सों में बेच दिया गया. अब स्थिति यह है कि इतने बड़े हादसे के बाद भी अधिकारी यह बताने में नाकाम हैं कि उस खास हिस्से पर किस बिल्डर का कब्जा है जहां यह हादसा हुआ.
सिस्टम की अनदेखी और कागजों में फंसी जल निकासी की योजना
यह हादसा सिर्फ एक गड्ढे की वजह से नहीं बल्कि पिछले 10 साल से चल रही प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है. जिस जगह पर पानी भरा था, वहां 2015 में ही सिंचाई विभाग ने हिंडन नदी में पानी मोड़ने के लिए एक रेगुलेटर बनाने का प्रस्ताव दिया था. साल 2016 में इसके सर्वे और डिजाइन के लिए पैसे भी जारी किए गए थे लेकिन फाइलें दफ्तरों के चक्कर ही काटती रहीं. अक्टूबर 2023 की एक चिट्ठी से खुलासा हुआ है कि सिंचाई विभाग ने बार-बार नोएडा प्राधिकरण को चेतावनी दी थी कि विकासशील सेक्टरों का पानी निकालने के लिए पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं. इसके बावजूद प्राधिकरण ने ड्रेन के बहाव और गहराई जैसे जरूरी सवालों का जवाब तक नहीं दिया जिससे यह जानलेवा तालाब बन गया.
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दो घंटे का खौफनाक संघर्ष और सुरक्षा मानकों की धज्जियां
शनिवार की सुबह युवराज अपने घर के बेहद करीब थे जब घने कोहरे के कारण उनकी एसयूवी अनियंत्रित होकर गहरे गड्ढे में जा गिरी. वहां न तो कोई बैरिकेडिंग थी, न रिफ्लेक्टर और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगा था. हादसे के बाद युवराज अपनी जान बचाने के लिए करीब दो घंटे तक कार की छत पर खड़े होकर चिल्लाते रहे, जबकि उनके बेबस पिता और बचाव दल उन्हें देख रहे थे. सुबह 4:30 बजे उनका शव बरामद हुआ जो सीधा-सीधा प्रशासनिक और निर्माण कंपनियों की लापरवाही का मामला है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते वहां सुरक्षा घेरा बनाया गया होता या जल निकासी की योजना पर काम हुआ होता तो आज एक नौजवान की जान नहीं जाती.
बिल्डरों पर केस और जवाबदेही पर उठते गंभीर सवाल
इस दर्दनाक घटना के बाद पुलिस ने दो रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 105, 106 और 125 के तहत एफआईआर दर्ज की है. इसमें गैर-इरादतन हत्या और लापरवाही से मौत जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं. नागरिक अधिकार कार्यकर्ता अब मांग कर रहे हैं कि जमीन के मालिकाना हक को जल्द से जल्द स्पष्ट किया जाए और उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो जिन्होंने ड्रेनेज प्लान को लटकाए रखा. नोएडा जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में ऐसी बुनियादी खामियां यह बताती हैं कि बिल्डरों के फायदे के लिए आम आदमी की सुरक्षा को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है. अब देखना यह है कि युवराज को न्याय मिलता है या यह मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा.