Allahabad High Court Slams Noida DM Medha Roopam: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की कड़ी आलोचना की है. अदालत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट आकृति चौधरी की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत हिरासत को रद्द कर दिया. आकृति को नोएडा में मजदूरों के पक्ष में विरोध-प्रदर्शन के बाद तकरीबन 5 महीने तक जेल में रखा गया था.
अदालत का विस्तृत फैसला आया
सोमवार, 7 सितंबर को हाईकोर्ट का विस्तृत फैसला सामने आगे जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने चौधरी को तुरंत रिहा करने और अधिकारियों को उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने ये भी कहा कि ये रकम उनकी हिरासत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूली जानी चाहिए, जिसमें संबंधित स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) भी शामिल हैं. इस फैसले में अदालत ने ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ का भी जिक्र किया.
कोर्ट ने हिरासत के आधार पर सवाल उठाए
25 साल की आकृति चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने उन पर मजदूरों के आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों को पत्थरबाजी और आगजनी के लिए उकसाने का आरोप लगाया था. इसके बाद यूपी सरकार ने उन पर सख्त NSA कानून लागू कर दिया था.
हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट को आकृति चौधरी के खिलाफ पेश किए गए सबूतों में कमियां मिलीं और हिरासत की कहानी को ‘मनगढ़ंत’ बताया. जजों ने ये भी गौर किया कि उनकी गिरफ्तारी से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत जरूरी नोटिस ठीक से नहीं दिया गया था. बेंच ने जिला मजिस्ट्रेट की आलोचना की कि उन्होंने इतने गंभीर प्रिवेंटिव डिटेंशन को मंजूरी देने से पहले पुलिस के सबूतों की ठीक से जांच-पड़ताल नहीं की.
जॉर्ज ऑरवेल का जिक्र
अपना आदेश सुनाते हुए, कोर्ट ने जॉर्ज ऑरवेल की डिस्टोपियन रचनाओं का जिक्र किया और चेतावनी दी कि बिना रोक-टोक वाली प्रशासनिक कार्रवाई उत्तर प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ की तरफ धकेल सकती है. कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि जो अधिकारी अपने संवैधानिक कर्तव्यों के विपरीत काम करते हैं, वे “ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी विरासत” का रूप ले सकते हैं. अदालत ने पाया कि ऐसा लगता है कि आकृति चौधरी को एक मिसाल के तौर पर इस्तेमाल किया गया ताकि लोगों को मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने या उनका समर्थन करने से रोका जा सके.
सरकार सबूत पेश करने में नाकाम
इससे पहले 1 सितंबर 2026 को कोर्ट ने राज्य सरकार से वीडियो सबूत पेश करने को कहा था, जिसमें कथित तौर पर चौधरी को हिंसा के लिए उकसाने का दावा किया गया था. सरकार ने और वक्त मांगा, लेकिन बेंच ने इनकार कर दिया, क्योंकि वो पहले ही तकरीबन 5 महीने जेल में बिता चुकी थीं.
‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ क्या है?
‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ (Orwellian Dystopia) का मतलब एक ऐसे समाज से है जहां सरकार का बहुत ज्यादा कंट्रल होता है, लगातार निगरानी रखी जाती है, सेंसरशिप और प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल होता है और लोगों की आजादी को दबाया जाता है. ये शब्द ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑर्वेल से आया है, खासकर उनके उपन्यास ‘1984’ से, जिसमें एक ऐसे तानाशाही राज्य को दिखाया गया है जहां अधिकारी जानकारी में हेर-फेर करते हैं और नागरिकों पर नजर रखते हैं. आज ‘ऑर्वेलियन’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर ऐसे हालात के लिए किया जाता है जहां संस्थाएं बहुत ज्यादा नियंत्रण करती हैं, असहमति को रोकती हैं या सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती हैं, जिससे डर का माहौल बनता है और लोगों की निजी आजादी सीमित हो जाती है.
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