उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले राज्यसभा की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाले हो सकते है. जिसको लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के भीतर सियासी समीकरण साधने की कवायद तेज हो गई है. दोनों ही दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवारों के चयन का है. बीजेपी के सामने जहां बड़े नेताओं को राज्यसभा भेजने और जातीय समीकरण साधने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है, वहीं समाजवादी पार्टी के सामने PDA फॉर्मूले और मौजूदा चेहरों के बीच फैसला करने का सवाल है.
बीजेपी में बड़े चेहरों या OBC समीकरण पर दांव?
बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों को लेकर कई नामों की चर्चा शुरू हो गई है. सवाल यह है कि क्या पार्टी अपने बड़े नेताओं को राज्यसभा भेजेगी या आगामी चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पिछड़ा और OBC कार्ड खेलेगी. स्मृति ईरानी, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान जैसे नामों को लेकर भी चर्चा है. हालांकि, उम्मीदवारों को लेकर अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है. इसके साथ ही आगामी विधानसभा उपचुनावों और विधान परिषद चुनावों को देखते हुए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन भी उम्मीदवार चयन में अहम भूमिका निभा सकता है.
सहयोगी दलों को कितनी सीट?
बीजेपी के सामने एक और अहम सवाल सहयोगी दलों को लेकर है. चर्चा है कि बीजेपी एक या दो सीट अपने सहयोगियों के लिए छोड़ सकती है. ऐसे में सवाल यह है कि अगर सहयोगी दल को राज्यसभा का टिकट दिया जाता है तो वह सीट किस दल के खाते में जाएगी? अपना दल (एस), निषाद पार्टी और RLD जैसे सहयोगी दलों के पास विधानसभा में संख्या है. लिहाजा राज्यसभा चुनाव में सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है.
सपा में भी दो सीटों पर बढ़ी जोर-आजमाइश
समाजवादी पार्टी के भीतर भी राज्यसभा की दो सीटों को लेकर दावेदारों की सक्रियता बढ़ने की चर्चा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सपा एक बार फिर वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव को राज्यसभा भेजेगी या इस बार पार्टी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के तहत नए चेहरों पर दांव लगाएगी. अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है और राज्यसभा की बची हुई सीट के लिए बीजेपी और सपा के बीच सीधा सियासी गणित बन सकता है.
क्या कहता है विधानसभा का गणित?
2022 के विधानसभा चुनाव के बाद मौजूदा दलगत संख्या को आधार मानें तो राज्यसभा की एक सीट के लिए करीब 37 वोट की जरूरत होगी. मौजूदा संख्या के मुताबिक बीजेपी के पास करीब 256 विधायक, जबकि सपा के पास 101 विधायक हैं. बीजेपी अपने सहयोगी दलों के समर्थन के साथ सात सीटों पर दावा मजबूत कर सकती है. हालांकि सातवीं सीट के लिए उसे सहयोगियों के कुछ अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. वहीं सपा दो सीटों के लिए आवश्यक संख्या जुटाने की स्थिति में है. लेकिन अगर पार्टी तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो चुनाव की स्थिति बन सकती है. मौजूदा संख्या के मुताबिक बीजेपी , 256 सपा, 101 अपना दल (एस) 13 निषाद पार्टी ,RLD, 9 जनसत्ता दल लोकतांत्रिक ( राजा भैया) 2
10 सीटों का चुनाव, लेकिन असली पेच एक सीट पर?
सात सीट बीजेपी और सहयोगी दल, दो सीट समाजवादी पार्टी , तो बची एक सीट पर कौन उम्मीदवार होगा. और 10 से ज्यादा उम्मीदवार होते है तो चुनाव की स्थिति बनेगी. यूपी की 10 राज्यसभा सीटों में फिलहाल 9 बीजेपी और 1 सपा के पास है. इन सीटों पर बीजेपी के दो केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा और हरदीप सिंह पुरी तथा सपा के रामगोपाल यादव का कार्यकाल पूरा होने वाला है. ऐसे में इस चुनाव का असली रोमांच सिर्फ उम्मीदवारों के नामों में नहीं, बल्कि 10 सीटों के पीछे छिपे विधानसभा के गणित और सहयोगी दलों के समर्थन में है.
बीजेपी अपने खाते में कितनी सीट बरकरार रखती है, सहयोगियों को कितनी हिस्सेदारी देती है और सपा PDA के जरिए नए समीकरण बनाती है या पुराने चेहरे पर भरोसा करती है—इन सवालों के जवाब उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही साफ होंगे.
राज्यसभा के साथ विधान परिषद चुनाव भी होने हैं. ऐसे में यूपी में आने वाले दिनों में उम्मीदवारों के चयन के जरिए जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश और तेज होने की संभावना है.