काशी के विद्यामठ आश्रम में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक बड़ा ऐलान किया है. उन्होंने श्रीशंकराचार्य चतुरंगिणी सेना सभा का गठन कर दिया है. शुरुआत में 27 सदस्यों की कोर टीम बनाई गई है. साथ ही उन्होंने सनातन प्रतीकों की रक्षा के लिए जोरदार नारा दिया, ‘रोको, टोको और ठोको’. शंकराचार्य जी ने स्पष्ट किया कि समाज में खासकर हिंदू समुदाय के अंदर एक डर का माहौल बन गया है. लोग अन्याय देखते हैं, लेकिन भय के कारण आगे नहीं आ पाते. इस मनोवैज्ञानिक स्थिति को बदलने के लिए यह पहल की गई है. इसका मकसद किसी के खिलाफ आक्रामकता फैलाना नहीं, बल्कि लोगों के अंदर आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना जगाना है. जब तक मन से डर नहीं निकलेगा, समाज खुद की रक्षा नहीं कर पाएगा.
चतुरंगिणी सेना का उद्देश्य क्या है?
शंकराचार्य के अनुसार, चतुरंगिणी सेना सनातन धर्म के चार प्रतीकों की रक्षा के लिए अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित होगी, जो समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करेगी. इसका मुख्य फोकस गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और गौ-तस्करी को जमीनी स्तर पर रोकना है. समाज में सुरक्षा का भाव मजबूत करना है. ब्राह्मणों पर अत्याचार और सनातन पर हो रहे अन्याय को रोकना है. यह कोई अनियंत्रित भीड़ नहीं बल्कि एक अनुशासित ढांचा होगा. जहां भी अवैध गतिविधियां दिखेंगी, वहां चतुरंगिणी सेना सक्रिय भूमिका निभाएगी. धर्म और संस्कृति के प्रति लोगों को जागरूक करेगी.
‘रोको, टोको और ठोको’ का मतलब
शंकराचार्य ने अपने चर्चित नारे “रोको, टोको और ठोको” की विस्तृत व्याख्या की है. जब भी कोई गोवंश को नुकसान पहुंचाने या तस्करी करने की कोशिश करेगा, तो सबसे पहले उसे रोका जाएगा. अगर वह नहीं मानता, तो उसे नियमों और धर्म की दुहाई देकर टोका जाएगा. इसके बावजूद यदि कोई अपराध से पीछे नहीं हटता, तो आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए ‘ठोकने’ यानी कड़े कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘ठोकने’ का अर्थ अराजकता या अवैध हिंसा कतई नहीं है. यह पूरी तरह से कानून और संविधान के दायरे में रहकर किया जाएगा.
पीले वस्त्र और हाथ में परशु
शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि यह कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक सोची-समझी योजना है. सेना की शुरुआत 27 सदस्यों के कोर ग्रुप से हो रही है. अगले 10 महीनों में छोटी-छोटी इकाइयों (पत्ती) के जरिए इसे ‘अक्षयवर्णी सेना’ का रूप दिया जाएगा, जिसमें लाखों सदस्य जुड़ेंगे. ना के सदस्य पीले वस्त्र धारण करेंगे और प्रतीकात्मक रूप से अपने साथ ‘परशु’ (फरसा) रखेंगे. हाथ में ‘परशु’ धर्म की रक्षा और आत्मरक्षा की तैयारी का प्रतीक है. आगामी माघ मेले तक इस सेना को पूरी तरह सक्रिय करने का लक्ष्य रखा गया है.
कानून-व्यवस्था और ‘निर्बल का बल’
शंकराचार्य ने वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि आज सार्वजनिक स्थानों पर भी अपराध हो रहे हैं. ‘चतुरंगिनी सेना’ का मुख्य उद्देश्य ‘निर्बल का बल’ बनना है. यह सेना न केवल गायों की तस्करी रोकेगी, बल्कि समाज के कमजोर तबके और धर्म पर हो रहे प्रहारों के खिलाफ एक ढाल का काम करेगी.
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