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पाकिस्तान में तिरंगा फहराने वाले बने सरपंच, 21 लाख फॉलोअर्स वाले को 33 वोट… राजस्थान पंचायत चुनाव के 3 अजब-गजब किस्से

शेखावाटी के झुंझुनूं में चुनाव प्रचार के दौरान एक महिला प्रत्याशी ने वादा किया था कि अगर वह सरपंच बनती हैं तो गांव के अविवाहित युवाओं की सगाई और शादी कराने की जिम्मेदारी उठाएंगी.

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राजस्थान में सरपंच चुनाव के दौरान कई रोचक और दिलचस्प किस्से सामने आए हैं. बाड़मेर में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ा इतिहास रखने वाले 77 वर्षीय पदमसिंह सोढ़ा सरपंच का चुनाव जीत गए, तो झुंझुनूं में कुंवारे युवाओं की शादी कराने का वादा चर्चा में रहा. वहीं, जोधपुर के ओसियां क्षेत्र में सोशल मीडिया पर 21 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स रखने वाले प्रत्याशी को महज 33 वोट मिले.

पाकिस्तान में तिरंगा फहराने वाले बने सरपंच

बाड़मेर के छाछरो गांव में 77 वर्षीय ठाकुर पदमसिंह सोढ़ा की जीत सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि इतिहास और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कहानी भी है. पदमसिंह सोढ़ा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के छाछरो गांव के ठाकुर थे. 6 दिसंबर 1971 को ब्रिगेडियर भवानी सिंह के साथ पाकिस्तान की ओर गए सिविल दस्ते में वे भी शामिल थे. उनके बड़े भाई लक्ष्मणसिंह सोढ़ा पाकिस्तान के रेल मंत्री रह चुके हैं. युद्ध के दौरान पदमसिंह और उनके परिवार ने भारतीय सेना का साथ दिया और अपनी पुश्तैनी हवेली पर भारतीय तिरंगा फहराया. भारतीय सेना ने ब्रिगेडियर भवानी सिंह के नेतृत्व में पश्चिमी सीमा पर बाखासर क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए छाछरो पर कब्जा किया था. यह इलाका करीब आठ महीने तक भारतीय सेना के नियंत्रण में रहा.

भारतीय सेना का साथ देने के आरोप में पाकिस्तान ने पदमसिंह और उनके भाई लक्ष्मणसिंह पर दो-दो लाख रुपये का इनाम घोषित किया था. बाद में पदमसिंह को अपना पुश्तैनी घर और जमीन छोड़कर परिवार सहित भारत आना पड़ा. उनका परिवार चौहटन होते हुए बाड़मेर के बावड़ी कला गांव में बस गया.

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करीब डेढ़ साल पहले बावड़ी कला से नया राजस्व गांव छाछरो बनाया गया. इस नाम के पीछे पाकिस्तान में छूटी जन्मभूमि की याद और 1971 के युद्ध से जुड़ा इतिहास भी है. अब उसी नाम वाले गांव में पदमसिंह सोढ़ा सरपंच निर्वाचित हुए हैं.

कुंवारों की शादी कराने का वादा

दूसरा दिलचस्प मामला, शेखावाटी के झुंझुनूं जिले से सामने आया. यहां चुनाव प्रचार के दौरान एक महिला प्रत्याशी का वीडियो चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने वादा किया कि अगर वह सरपंच बनती हैं तो गांव के अविवाहित युवाओं की सगाई और शादी कराने की जिम्मेदारी उठाएंगी. हालांकि, बाद में महिला ने साफ किया कि वह वास्तव में चुनाव नहीं लड़ रही थीं. उनके मुताबिक उन्होंने जनता का मूड जानने के लिए यह वीडियो बनाकर वायरल किया था. इस तरह शादी कराने का वादा चुनावी चर्चाओं और लोगों के बीच हंसी-मजाक का विषय बन गया.

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21 लाख फॉलोअर्स, वोट मिले सिर्फ 33

तीसरा मामला जोधपुर जिले की ओसियां तहसील की इंदोक की ढाणी ग्राम पंचायत का है. यहां यूट्यूबर और ज्योतिषी ओमप्रकाश वैष्णवी ने सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ा. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके 21 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स बताए जाते हैं, लेकिन करीब 1,600 मतदाताओं वाली पंचायत में उन्हें केवल 33 वोट मिले. यह नतीजा सोशल मीडिया की लोकप्रियता और जमीनी राजनीति के बीच के अंतर को दिखाता है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाखों लोगों तक पहुंच रखने का मतलब यह नहीं कि स्थानीय चुनाव में भी उतना ही जनसमर्थन मिलेगा.

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