Mewar Royal Family Property Dispute: उदयपुर के मेवाड़ राजघराने में 'वसीयत' की जंग कोर्ट पहुंच गई है. दिवंगत अरविंद सिंह मेवाड़ की अरबों की संपत्ति और विरासत को लेकर उनके बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ एक तरफ हैं, तो दूसरी तरफ उनकी दोनों बहनें पद्मजा कुमारी और भार्गवी कुमारी खड़ी हैं. विवाद का मुख्य केंद्र फरवरी 2025 की एक वसीयत है. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का दावा है कि उनके पिता अरविंद सिंह मेवाड़ ने अपनी स्व-अर्जित संपत्तियों का अधिकार उन्हें दिया है. वहीं, उनकी बहनें इस वसीयत की वैधता को चुनौती दे रही हैं. मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका है, जहां जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद ने लक्ष्यराज की याचिका पर उनकी बहनों, मां विजयराज कुमारी और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
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इन 3 बड़े बिंदुओं पर फंसा है पेंच
मेवाड़ राजघराने के इस हाई-प्रोफाइल केस में मुख्य रूप से तीन कानूनी चुनौतियां हैं:
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- वसीयत की वैधता: अदालत के सामने वसीयत पेश करने वाले को ही उसकी वैधता साबित करनी होगी. वहीं, कोर्ट को यह तय करना है कि क्या यह वसीयत कानूनी रूप से सही है? गवाहों की मौजूदगी और स्वेच्छा जैसे पहलुओं पर बहनों ने सवाल उठाए हैं.
- कौन सी संपत्ति 'निजी' और कौन सी 'पुश्तैनी : सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि कौन सी संपत्ति 'निजी' है और कौन सी 'पुश्तैनी'. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में अगर संपत्ति को संयुक्त विरासत या ट्रस्ट का हिस्सा माना गया तो वसीयत का प्रभाव बदल जाएगा.
- कौन मालिक, किसका नियंत्रण: मामला सिर्फ जमीन-जायदाद का नहीं, बल्कि होटल्स, बिजनेस और ट्रस्ट के प्रबंधन पर नियंत्रण का भी है.
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सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद दिल्ली पहुंचा केस
पहले इस विवाद से जुड़े अलग-अलग मामले राजस्थान और बॉम्बे हाईकोर्ट में चल रहे थे. कानूनी प्रक्रिया में टकराव और देरी से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इन सभी केसों को एक साथ दिल्ली हाईकोर्ट में सुना जाए. अब दिल्ली हाईकोर्ट को उन हजारों दस्तावेजों और ट्रस्टों की सूची को खंगालना होगा जो दशकों पुराने हैं. वैसे भी मेवाड़ राजघराने में संपत्ति विवाद नया नहीं है. इसकी जड़ें 1980 के दशक तक जाती हैं. साल 2020 में भी उदयपुर की जिला अदालत ने संपत्तियों के बंटवारे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था.
दिल्ली हाईकोर्ट में अब आगे क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी तय की है. कोर्ट अब यह देखेगा कि क्या वसीयत को सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है या नहीं. चूंकि यह मामला देश की सबसे ऊंची अदालत के निर्देश पर दिल्ली आया है, इसलिए सबकी नजरें इसके फैसले पर टिकी हैं. हालांकि, कानूनी जानकारों का मानना है कि संपत्तियों के जटिल ढांचे को देखते हुए यह लड़ाई लंबी खिंच सकती है.