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जोधपुर कोर्ट का अहम फैसला: घरेलू हिंसा केस में पति की क्षेत्राधिकार आपत्ति खारिज

घरेलू हिंसा के एक अहम मामले में जोधपुर शहर की अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पीड़िता जहां रह रही है, वहीं से न्याय की लड़ाई लड़ सकती है. जोधपुर न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पति की ओर से दायर क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन) संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया है.

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घरेलू हिंसा के एक अहम मामले में जोधपुर शहर की अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पीड़िता जहां रह रही है, वहीं से न्याय की लड़ाई लड़ सकती है. जोधपुर न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पति की ओर से दायर क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन) संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया है.

क्या है पूरा मामला?

दीपिका सोनी, निवासी मोती चौक काजीवाड़ा, जोधपुर, ने अपने पति बीजू बाबू (निवासी अंडमान-निकोबार) के खिलाफ घरेलू हिंसा का परिवाद और अंतरिम भरण-पोषण की अर्जी दायर की थी. पति की ओर से दलील दी गई कि विवाह अंडमान-निकोबार में हुआ और दोनों ने जोधपुर में पति-पत्नी के रूप में कभी साथ निवास नहीं किया. इसलिए जोधपुर की अदालत को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है.

पति के वकील ने Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की धारा 27 और Code of Criminal Procedure, 1973 की धारा 177 का हवाला देते हुए परिवाद खारिज करने की मांग की.

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पत्नी की ओर से क्या दलील दी गई?

दीपिका सोनी के वकील ने कोर्ट में आधार कार्ड और वोटर आईडी पेश कर बताया कि उनका स्थायी पता जोधपुर का ही है. साथ ही महिला थाना पूर्व, जोधपुर द्वारा पेश की गई चार्जशीट (धारा 498-A, 406, 323 आईपीसी) में भी यही पता दर्ज है.

वकील ने यह भी तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों के अनुसार घरेलू हिंसा का मामला उस स्थान पर भी दायर किया जा सकता है, जहां पीड़िता स्थायी या अस्थायी रूप से निवास करती हो.

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अदालत का क्या रहा फैसला?

मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता राठौड़ ने पति की आपत्ति को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि जोधपुर कोर्ट को क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं है.

अदालत ने पति की ओर से दायर आपत्ति प्रार्थना-पत्र को खारिज कर दिया, जिससे अब घरेलू हिंसा और भरण-पोषण के मूल मामले की सुनवाई जोधपुर में ही आगे बढ़ेगी.

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क्यों अहम है यह फैसला?

यह आदेश उन महिलाओं के लिए राहतभरा संकेत है, जो वैवाहिक विवाद के बाद अपने मायके या किसी अन्य शहर में रह रही हैं. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि न्याय पाने के लिए पीड़िता को उसी शहर में जाने की बाध्यता नहीं है, जहां विवाह हुआ या पति रहता है. यह फैसला घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

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