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400 साल बाद औरंगजेब जिंदा क्यों हुआ, क्या CM फडणवीस को फंसाने की साजिश है?

औरंगजेब की कब्र पर छिड़े विवाद पर सामना मुखपत्र में एक संपादकीय लिखा गया है, जिसमें औरंगजेब की जिंदगी और उसके द्वारा किए गए कामों का वर्णन है। साथ ही क्रब पर छिड़े विवाद को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ साजिश बताया गया है।

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Devendra Fadnavis

औरंगजेब 400 साल से कब्र में आराम कर रहा है, लेकिन अब अचानक उसे जिंदा कर दिया गय है। उसकी कब्र पर महाराष्ट्र में दंगे भड़काए गए। नागपुर शहर का चुनाव दंगे भड़काने के लिए किया गया। क्या मुख्यमंत्री फडणवीस को मुश्किल में डालने के लिए नागपुर को चुना गया? नवहिंदुत्ववादियों की राजनीति में भाजपा के अपवित्र लोग खाद डालने का काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र के लिए यह खतरा है! आज सामना मुखपत्र में छपे संपादकीय में लिखा गया है कि नागपुर दंगे के पीछे भाजपा के ही लोग हो सकते हैं, जो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को फंसाना चाहते हैं। तैमूर भी क्रूर था। काफिरों को मारना चाहता था, फिर भी बॉलीवुड के एक परिवार (सैफ-करीना) ने बेटे का नाम तैमूर रखा है। औरंगजेब और बाकी लोगों की तरह अमृत काल में वाराणसी में कॉरिडोर बनाने के लिए मंदिर पर भी तो बुलडोजर चलाया गया।

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विवाद का मकसद अराजकता फैलाना

400 साल पहले कब्र में दफन हुए आलमगीर औरंगजेब को लेकर महाराष्ट्र में दंगे भड़क उठे। खास बात यह है कि दंगों का केंद्र नागपुर है। राज्य के राजनेता ही दंगे करवाते हैं, यह सच है, लेकिन उन राजनेताओं को अपने निर्वाचन क्षेत्र और आसपास दंगे नहीं चाहिए होते। इसलिए नागपुर के दंगों में मुख्यमंत्री फडणवीस की भूमिका है, यह मानने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। मुख्यमंत्री फडणवीस के विधानसभा क्षेत्र में यह सब घटित हुआ। फडणवीस को बदनाम करने, मुसीबत में डालने के लिए क्या नागपुर को युद्ध का मैदान बनाया गया? यह सवाल है। नागपुर के दंगों से गृह मंत्रालय की नींव कमजोर पिलर पर खड़ी है, यह दिखाई दिया।

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बीड, परभणी से नागपुर तक इसका असर रोज देखने को मिल रहा है। गुजरात के दाहोद में 3 नवंबर 1668 को औरंगजेब का जन्म हुआ। वह दिल्ली गया और दिल्ली से महाराष्ट्र पर कब्जा करने निकला, लेकिन महाराष्ट्र में ही कब्र में दफन हो गया। औरंगजेब की कई बेगम थीं, लेकिन हीराबाई से उसे प्रेम था। वह गुजरात की ही थी। अब दिल्ली में गुजराती राजनेताओं की ही सत्ता है। उन्हीं राजनेताओं के समर्थकों को महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र खोदना है। इन्हीं समर्थकों ने गांधी के हत्यारे गोडसे का सम्मान किया, उन्हें हिटलर भी प्रिय है। महाराष्ट्र में इस तरह का जहर फैलाकर नवहिंदुत्ववादियों के देश में अराजकता फैलाना है।

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बाबर खत्म हुआ तो औरंगजेब निकाल लिया

हिंदू-मुस्लिम झगड़े को भड़काने की बाबर की क्षमता अब खत्म हो गई है। पाकिस्तान के कारण भी अब दंगे नहीं भड़कते। इसलिए कब्र से औरंगजेब को बाहर निकालने की योजना है। महाराष्ट्र के एक विधायक अबू आजमी ने कहा, ‘औरंगजेब क्रूर शासक नहीं था। उसकी लड़ाई धर्म की नहीं, बल्कि सत्ता की थी। उसने कई हिंदू मंदिर बनवाए। अबू आजमी के बयान से हंगामा शुरू हो गया। मुसलमानों को आज भी बाबर, औरंगजेब उनके शासक लगते हैं। वे लोग उनकी जय-जयकार करते हैं। आज के नवहिंदुत्ववादियों के रास्ते में आते हैं और हल्ला-गुल्ला करते हैं। इस्लामी दरबारी मोहम्मद साकी मुस्तैद खान ने ‘मासीर-ए-आलमगीरी’ (1731) में लिखा है कि औरंगजेब ने फरमान जारी करके काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनवाई। अन्य धर्मों के लोगों का जबरन धर्मांतरण कराने का आदेश दिया। मथुरा के केशवराय मंदिर को नष्ट किया और जोधपुर के कई मंदिरों को तोड़कर उनके अवशेष जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे पाट दिए।

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औरंगजेब ने बाप को कैद किया, 3 भाई मरवाए

सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर और अन्य सिख धर्मावलंबियों की हत्या उसने इस्लाम धर्म अस्वीकार करने की वजह से की। छत्रपति संभाजी राजे की हत्या उसने क्रूरता से की। औरंगजेब सत्तापिपासु और धर्मांध था। उसने अपने बाप शाहजहां को कैद किया। 3 भाइयों दारा शिकोह, शाहशुजा और मुराद को भी मार डाला। ऐसा औरंगजेब किसी भी धर्म का हो, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए आदर्श नहीं हो सकता। मुगल शासक भारत में तलवार लेकर आए थे, यहां की संपत्ति लूटने के लिए। उसके पीछे धार्मिक प्रेरणा निश्चित रूप से थी।

1399 में भारत पर हमला करने के लिए तैमूर लंगड़ा घुस आया। उसने हजारों निर्दोषों का कत्ल किया। ‘तुजुक-ए-तैमूरी’ में तैमूर कहता है, ‘हिंदुस्थान में घुसने का मेरा हेतु साफ है। मैं यहां पर्यटन के लिए नहीं आया हूं। काफिरों को मारना, दूसरे काफिरों की दौलत लूटना मेरा उद्देश्य है। क्योंकि यह मुसलमानों के लिए मां के दूध जितना ही प्रिय है। ऐसा होते हुए भी देश के एक प्रसिद्ध बॉलीवुड परिवार ने अपने बेटे का नाम ‘तैमूर’ रखा है और हमारे प्रधानमंत्री उस तैमूर की प्रशंसा करते हैं। यह सब औरंगजेब की कब्र खोदने वाले लोग सहन करते हैं।

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काशी के मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं

वाराणसी यानी काशी में औरंगजेब ने मंदिर तोड़े। अब ‘अमृत काल’ में वाराणसी में कॉरिडोर बनाने के लिए सैकड़ों मंदिरों और प्राचीन मूर्तियों पर बुलडोजर चलाया गया। उन ध्वस्त की गई मूर्तियों का आगे क्या हुआ? कोई नहीं बता सका। मोदी के कार्यकाल में यह मूर्तिभंजन हुआ। औरंगजेब निश्चित रूप से क्रूर था, लेकिन बाद में आए ब्रिटिश शासक भी क्रूर निकले। उन्होंने आजादी के लिए लड़ने वाले, भारतीय क्रांतिकारियों को क्रूरता से मार डाला। जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलीबारी करने वाला जनरल डायर ब्रिटिश शासक था। आज हमारे ब्रिटिशों से उत्तम संबंध हैं। मुगलों के निशान हम मिटा रहे हैं, लेकिन ब्रिटिशों के निशान संजोकर रखे हुए हैं। औरंगजेब ने अपने बाप, भाइयों को जेल में डाल दिया या खत्म किया। आज लालकृष्ण आडवाणी की स्थिति देखकर कई लोग शाहजहां को याद किए बिना नहीं रह पाते हैं।

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औरंगाबाद का नाम बालासाहेब ने बदला

मराठा साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने की प्रतिज्ञा करके बड़ी तैयारी के साथ औरंगजेब दक्षिण में आया और औरंगाबाद में डेरा डालकर बैठ गया। औरंगाबाद के प्रति इस बादशाह को कुछ खास आकर्षण रहा होगा। दरअसल, इस गांव का मूल नाम खिर्की था। 1604 में अबिसीनियन के गुलाम के रूप में आए मालिक अंबर ने इसे बसाया। 1626 में इस चतुर वजीर की मृत्यु के बाद उसके बेटे फत्ते खान ने इस गांव का नाम फत्तेनगर कर दिया, लेकिन शाहजहां बादशाह के शासनकाल में ही दख्खन का सूबेदार बनकर आए औरंगजेब ने इसका नाम औरंगाबाद कर दिया। (साल 1990 में हिंदू हृदय सम्राट शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे इस शहर में आए। उन्होंने औरंगजेब की कब्र खोदो, यह बात नहीं कही, बल्कि औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजी नगर करके औरंगजेब का अस्तित्व ही यहां से मिटा दिया। औरंगजेब जब मरा तब सम्राट अशोक को भी जितना बड़ा साम्राज्य नहीं मिला था, उससे विशाल साम्राज्य पर औरंगजेब का कब्जा था, लेकिन यह साम्राज्य मराठों ने खोखला साबित कर दिया, जो धीरे-धीरे ढहता गया।

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औरंगजेब की कब्र बिल्कुल सादी

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औरंगजेब यहां जीतने के लिए आया और महाराष्ट्र की मिट्टी में ही दफन हो गया। संभाजी नगर से 14 मील दूर खुलताबाद के शीतल परिसर में औरंगजेब की सादी कब्र उसकी पराजय का इतिहास बयां करती है। उसकी कब्र बिल्कुल सादी हो, ऐसी इच्छा औरंगजेब ने मरने से पहले प्रकट की थी। वेरूल की गुफाओं की चोटियों पर बसा यह रोजा खुलताबाद मतलब कब्रों का गांव। शेख जैनुद्दीन इस्लामी संत ने जहां चिरनिद्रा ली, उसी परिसर में औरंगजेब ने अपनी कब्र पहले से ही तैयार करवा रखी थी। पास में ही उसके बेटे अजमशाह की भी कब्र है, लेकिन औरंगजेब बादशाह की कब्र पर छत तक नहीं है। कब्र की सीढ़ियां, बगल की जाली की दीवारें संगमरमर की हैं, लेकिन यह बाड़ा बाद में बना। ऐसा कहा जाता है कि इतने बड़े मुगल बादशाह की यह सादी कब्र देखकर लॉर्ड कर्जन ने कुछ निर्माण करवाया है। औरंगजेब को कोई लत नहीं थी। किसी को भी गलत बढ़ावा उसने कभी नहीं दिया, ऐसा यदुनाथ सरकार ने कहा है।

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क्या बीबी का मकबरा भी उखाड़ना है?

आलमगीर जिंदा पीर ऐसा भी उसे लोग बोलते। स्वयं कोई उद्योग करना चाहिए, इसलिए हाथों से कपड़े की टोपियां बुनता था। अपनी मृत्यु के बाद इन टोपियों से और कुरान की प्रतियां लिखवाकर जो पैसे मिलें, वे फकीरों में बांट दिए जाएं, ऐसा उसने लिखकर रखा था। उसके साथ सवारी में शामिल रहने वाली उसकी बेगम रबिया उल दौरानी के स्मारक को बनाने के लिए ताजमहल की प्रतिकृति बनाने का उसने प्रयास किया। ‘बीबी का मकबरा’ इस नाम से यह सुंदर इमारत आज छत्रपति संभाजी नगर में कहीं से भी प्रवेश करने पर नजर आती है। दक्षिण का ताजमहल के रूप में यह इमारत प्रसिद्ध है। अब जिन्हें औरंगजेब की कब्र उखाड़ना है, क्या उन्हें इस ताजमहल को भी उखाड़ना है? औरंगजेब के नाम पर महाराष्ट्र में राजनीति हो रही है, यह उचित नहीं है। औरंगजेब की कब्र मराठा शौर्य का विजय स्तंभ है। उस स्तंभ को गिराने की कोशिश करने वाले इतिहास के शत्रु हैं। कब्र में पड़ा औरंगजेब महाराष्ट्र के मूर्खों ने जिंदा कर दिया। वह उन्हीं के सिर पर उल्टा पड़ गया।

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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