मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पिता के जीवित रहते उनकी संपत्ति में पत्नी और बेटे अपने आप हिस्सा मांगने का अधिकार नहीं जता सकते. इसी आधार पर कोर्ट ने एक महिला और उसके दो बेटों की याचिका खारिज कर दी. उन्होंने अपने पति और पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगा था. इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आशीष श्रोती ने कहा कि पत्नी को कानून के तहत संपत्ति का सह-उत्तराधिकारी सदस्य यानी कोपार्सनर नहीं माना जा सकता. कोर्ट के अनुसार, अगर बेटों की दलील मान भी ली जाए, तब भी संपत्ति में अधिकार का दावा केवल दोनों बेटे ही कर सकते थे, पत्नी नहीं.
26 अक्टूबर को दिए गए आदेश में कोर्ट ने बताया कि महिला और उसके बेटों ने खुद अपनी याचिका में कहा था कि जमीन उनके पति को उनके पिता से बंटवारे में मिली थी. यानी बंटवारे के बाद यह जमीन पति की अपनी संपत्ति बन गई थी. इसलिए उनके जीवित रहते पत्नि और बेटे उसमें हिस्सा नहीं मांग सकते थे. कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद हर मामले में बेटे को जन्म से ही पूर्वजों की संपत्ति में हिस्सा मिलने का नियम लागू नहीं होता. केवल इस आधार पर कि जमीन पहले परिवार के पूर्वजों संपत्ति थी, बेटा पिता के जीवित रहते बंटवारे की मांग नहीं कर सकता.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला परिवार की जमीन को लेकर हुए विवाद से जुड़ा था. एक महिला ने अपने दो बेटों के साथ मिलकर अदालत में मुकदमा दायर किया था. उन्होंने जमीन पर अपना मालिकाना हक और कब्जा दिलाने की मांग की थी. महिला और उसके बेटों ने यह भी मांग की थी कि पति और पिता को उनकी हिस्सेदारी दिए बिना जमीन बेचने से रोका जाए.
उनकी ओर से वकील आशीष श्रीवास्तव ने दलील दी कि जमीन पूर्वजों की संपत्ति है और बेटों को जन्म से ही उसमें अधिकार मिल गया था. उन्होंने बताया कि साल 2010 में व्यक्ति ने जमीन बेचने और पत्नी-बेटों को हिस्सा नहीं देने की धमकी दी थी. इसके बाद मुकदमा चलने के दौरान उस व्यक्ति ने 2011 में जमीन का कुछ हिस्सा दूसरे व्यक्ति को बेच दिया. तब महिला और उसके बेटों ने अदालत में अपनी याचिका में बदलाव करने और उस बिक्री के कागजात को कैंसिल करने की मांग भी की है . वहीं, पति ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उसके जीवित रहते पत्नी और बेटे जमीन में हिस्सा नहीं मांग सकते.
निचली अदालतों ने भी खारिज किया था दावा
मई 2012 में ट्रायल कोर्ट ने महिला और उसके बेटों का मुकदमा खारिज कर दिया था. अदालत का कहना था कि हिंदू उत्तराधिकार एक्ट के तहत वे पिता के जीवित रहते केवल जन्म के आधार पर जमीन में हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकते. इसके बाद 2015 में पहले अतिरिक्त न्यायाधीश(Additional Judge) ने भी इस फैसले को बरकरार रखा. फिर महिला और उसके दोनों बेटों ने निचली अदालतों के फैसले को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी को सहदायिक यानी कोपार्सनर की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इस मामले में बेटों के दावे पर भी कोर्ट ने विचार किया, लेकिन पाया कि जमीन उनके पिता को अपने पिता से बंटवारे में मिली थी. बंटवारे के बाद यह उनकी स्वयं की संपत्ति बन गई थी. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उत्तम बनाम सौभाग सिंह मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया. उसने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद हर पैतृक संपत्ति में बेटे को जन्म से ही बंटवारा मांगने का अधिकार नहीं मिल जाता.
इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने महिला और उसके बेटों की याचिका खारिज कर दी. ध्यान देने वाली बात यह है की इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में पत्नी या बच्चों को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता. संपत्ति किस तरह मिली, और किस तरह की है और उस पर कौन-सा कानून लागू होता है, इन बातों के आधार पर अधिकार अलग-अलग हो सकते हैं.