आदिवासी नेत्री निशा भगत के अचानक निधन से गुमला समेत पूरे जनजातीय समाज में शोक है. उनके निधन से लोगों में दुख के साथ-साथ आक्रोश भी देखने को मिल रहा है. देर रात उनका पार्थिव शरीर गुमला पहुंचा. इसके बाद से ही डीएसपी रोड स्थित उनके घर पर श्रद्धांजलि देने वालों की भीड़ जुट रही है. राजनीतिक, सामाजिक और अलग-अलग संगठनों से जुड़े लोग निशा भगत के आखिरी दर्शन के लिए उनके घर पहुंच रहे हैं. शनिवार दोपहर 12 बजे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और रघुवर दास भी उनके घर पहुंचकर श्रद्धांजलि देंगे. इस दौरान जनजातीय समाज और संगठनों से जुड़े लोग आगे की रणनीति को लेकर भी चर्चा करेंगे.
निडर और मेहनती स्वभाव की थीं निशा भगत
निशा भगत के साथ काम कर चुके एक करीबी ने उनके पुराने दिनों को याद किया. उन्होंने बताया कि साल 2008-09 में जब वह गुमला में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के संगठन मंत्री के रूप में काम कर रहे थे, तब उन्होंने ही निशा भगत को संगठन से जोड़ा था. करीबी के मुताबिक, निशा भगत शुरू से ही निडर और साहसी स्वभाव की थीं. वह किसी भी मुश्किल से पीछे नहीं हटती थीं. जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहती थीं. संगठन के प्रति उनका जुड़ाव और किसी भी मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखने का तरीका उन्हें दूसरों से अलग पहचान देता था.
जनजातीय समाज में शोक की लहर
निशा भगत सामाजिक और जनजातीय मुद्दों को लेकर लगातार एक्टिव रहती थीं. वह इन मुद्दों पर अपनी आवाज उठाती थीं और संगठन के काम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं. उनके अचानक निधन से जनजातीय समाज और सामाजिक संगठनों को बड़ा झटका लगा है. उनके समर्थकों और जानने वालों का कहना है कि निशा भगत ने अपने साहस, संघर्ष और संगठन के लिए किए गए कामों से अलग पहचान बनाई थी. उनके काम और लोगों की मदद करने के उनके तरीके को लंबे समय तक याद किया जाएगा.