गुजरात के दो डेमोलिशन इन दिनों काफी चर्चा में है एक राजकोट का जंगलेश्वर और दूसरा सूरत का नाशिरनगर, जंगलेश्वर डेमोलिशन में जो खर्च आया उससे सबकी आंखे फट गईं, तो वहीं सूरत नाशीरनगर डेमोलिशन के बुलडोजर एक्शन में यही नहीं पता चल रहा कि किसके आदेश से बुलडोजर चला और इसी के चलते इनपर छिड़ी बहस अब तक खत्म नहीं हुई. गुजरात के राजकोट में जंगलेश्वर मेगा डिमोलिशन ड्राइव में हुए भ्रष्टाचार के आरोपों पर आज राजकोट महानगर पालिका के बिल रिजेक्शन के एक्शन ने एक तरह से मुहर लगा दी.
पहले चाय-नाश्ता और भोजन पर 27 लाख रुपये से ज्यादा खर्च का बिल सामने आया, फिर मिनरल वॉटर पर 12 लाख 40 हजार रुपये खर्च होने का दावा हुआ. अब पूरे ऑपरेशन पर करीब 3 करोड़ रुपये खर्च होने और बिलों में कथित अनियमितताओं को लेकर सियासत तेज हो गई है.
दरअसल 24 फरवरी 2026 को राजकोट महानगरपालिका ने जंगलेश्वर सहित आसपास के क्षेत्रों में मेगा डिमोलिशन ड्राइव चलाकर 1359 से लेकर करीब 1500 तक अवैध निर्माणों को हटाया. छह दिनों तक चले इस अभियान में नगर निगम, पुलिस, जेसीबी ऑपरेटर, मजदूर, वीडियोग्राफी टीम सहित करीब 4300 से 5000 कर्मचारी तैनात रहे.
कार्रवाई खत्म होने के बाद सबसे पहले भोजन और नाश्ते का 27 लाख 20 हजार 946 रुपये का बिल सामने आया. बिल के मुताबिक कर्मचारियों के लिए 21 हजार से ज्यादा चाय-बिस्कुट, गांठिया-जलेबी, पोहा, नाश्ते की प्लेटें, 13 हजार 390 स्पेशल लंच पैकेट, मसाला छाछ और करीब 4000 नींबू-अदरक शरबत की बोतलों की व्यवस्था की गई थी.
लेकिन विवाद तब और बढ़ गया जब मिनरल वॉटर पर 12 लाख 40 हजार 28 रुपये खर्च होने का नया बिल सामने आया. बिल में केवल तारीख और राशि दर्ज है, लेकिन किस दिन कितनी पानी की बोतलें खरीदी गईं, इसका कोई विवरण नहीं दिया गया. इससे खर्च की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठने लगे.
इतना ही नहीं, मंडप सर्विस पर करीब 6 लाख 70 हजार रुपये का खर्च भी सामने आया. इस तरह भोजन, पानी और अन्य व्यवस्थाओं का कुल खर्च 46 लाख रुपये से अधिक पहुंच गया. वहीं पूरे डिमोलिशन अभियान पर करीब 3 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी भी सामने आई है.
विवाद का एक और बड़ा कारण यह है कि मिनरल वॉटर की आपूर्ति का ठेका उमियाजी मंडप सर्विस एंड डेकोरेशन को दिया गया था. सवाल उठ रहे हैं कि जब राजकोट में कई मिनरल वॉटर निर्माता मौजूद हैं, तो पानी की खरीद एक मंडप सर्विस के माध्यम से क्यों की गई. इस बिल घोटाले के मीडिया कवरेज और विपक्ष के विरोध के बाद आखिर कार पुरे बिल की जांच के लिए एक समिति की रचना की गई है जो जांच कर रही है लेकिन इस बिच बुधवार को स्टैंडिंग कमिटी में एक बिल का अस्वीकार कर नई बहस छेड़ दी है I
स्टैंडिंग कमेटी के सामने जब इन बिलों को मंजूरी के लिए रखा गया तो सदस्यों ने भुगतान पर तत्काल रोक लगा दी. समिति ने पूछा कि तोड़फोड़ जैसी कार्रवाई में चाय, नाश्ता, भोजन और पेयजल पर इतना बड़ा खर्च कैसे हुआ. इसके बाद संबंधित अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा गया.
राजकोट शहर कांग्रेस ने पूरे मामले को “भ्रष्टाचार का गुजरात मॉडल” बताते हुए नगर निगम पर जनता के टैक्स के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाया है. कांग्रेस अध्यक्ष राजदीपसिंह जाडेजा का कहना है कि एक तरफ गरीब परिवारों के घर टूट रहे थे, लोग खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर थे, वहीं अधिकारी काजू कतली, खजूर रोल, समोसे, चाय और विशेष भोजन का आनंद ले रहे थे. कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि नगर निगम आयुक्त संतोषजनक जवाब नहीं देते, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा.
वहीं नगर निगम का कहना है कि हजारों कर्मचारी लगातार ड्यूटी पर तैनात थे. ऐसे में भोजन, चाय और पेयजल की व्यवस्था प्रशासनिक आवश्यकता थी ताकि कोई भी कर्मचारी कार्यस्थल छोड़कर बाहर न जाए. हालांकि अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि सभी खर्चों की जांच के बाद ही अंतिम भुगतान किया जाएगा.
मामला बढ़ने पर राजकोट महानगरपालिका ने एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित कर दी है. समिति में दो डिप्टी म्यूनिसिपल कमिश्नर, एक असिस्टेंट म्यूनिसिपल कमिश्नर, एक अकाउंटेंट और एक सिटी इंजीनियर को शामिल किया गया है. समिति सभी बिलों, पानी की खरीद, भोजन, वीडियोग्राफी और अन्य खर्चों की जांच करेगी. जांच रिपोर्ट आने तक विवादित बिलों के भुगतान पर रोक रहेगी.
अब सबकी नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है. यदि खर्च में गड़बड़ी या फर्जी बिलिंग साबित होती है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई हो सकती है. वहीं यदि खर्च को नियमों के अनुरूप पाया जाता है, तो नगर निगम को विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का मौका मिलेगा.
राजकोट महानगर पालिका के मेयर डॉ नेहल शुक्ला ने कहा, ‘जांच समिति के रचना की गई है वो एक अलग प्रक्रिया है और ये जो हुआ है वो इसीलिए की इसमें टेंडर प्रक्रिया नहीं की गई थी इनकी तरफ से दी गई आइटम में साफ़ लिखा है की समय के आभाव के चलते जो टेंडर प्रक्रिया होनी चाहिए थी वो नहीं की गई है इसलिये इस बिल को हमने नामंजूर किया है ना की इसमें की किसी आइटम की योग्यता या अयोग्यता को ध्यान रखा है बल्कि सरकार की गाइड लाइन का पालन नहीं किया गया है इसलिए बिल का अस्वीकार किया गया है.’
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