जहां कभी चरते थे मवेशी और होता था जंगली सूअरों का शिकार… आज वहां धड़कता है देश का दिल; जानिए CP का 100 साल पुराना इतिहास

दिल्ली का कनॉट प्लेस कभी अंग्रेजों के दौर का खास बाजार हुआ करता था. आज यह शॉपिंग, खानपान और घूमने-फिरने का बड़ा केंद्र है. जानिए इसकी शुरुआत, शानदार वास्तुकला और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से जुड़ी चर्चा के बारे में.

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दिल्ली के कनॉट प्लेस की सफेद इमारतें और ऐतिहासिक गोल बाजार (Photo-ANI)

दिल्ली में कनॉट प्लेस यानी CP सिर्फ शॉपिंग, खाने-पीने और घूमने की जगह नहीं है. इसकी सफेद इमारतें, गोल गलियां और बड़े-बड़े खंभे अपने अंदर करीब एक सदी का इतिहास समेटे हुए हैं. कभी अंग्रेजों की शान माने जाने वाले इस बाजार में आज हर तरह के लोग नजर आते हैं. यहां बड़े ब्रांड्स के शोरूम भी हैं, पुराने होटल भी और आए दिन होने वाले प्रदर्शन भी. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के चलते भी कनॉट प्लेस चर्चा में रहा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली की इस मशहूर जगह की शुरुआत कैसे हुई थी और इसका नाम कनॉट प्लेस क्यों पड़ा?

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अंग्रेजों ने क्यों बसाया कनॉट प्लेस?

साल 1911 में अंग्रेजों ने भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली लाने का फैसला किया. इसके बाद नई दिल्ली को एक शानदार राजधानी के रूप में बसाने की योजना बनी. अंग्रेज चाहते थे कि यहां सरकारी इमारतों के साथ एक ऐसा बड़ा बाजार भी हो, जहां खरीदारी और मनोरंजन की सुविधाएं मिल सकें एक ही जगह मिल सके . इसी योजना के तहत कनॉट प्लेस को बनाया गया. इसका नाम ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस आर्थर, ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया.

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किसने बनाया और कब हुआ तैयार?

कनॉट प्लेस को बनाने का काम साल 1929 में शुरू हुआ और 1930 के दशक के बीच तक इसका निर्माण पूरा हो गया. इसे तैयार करने में ब्रिटिश डिजाइनर रॉबर्ट टोर रसेल का बड़ा हाथ था . दिलचस्प बात यह है कि आज जहां कनॉट प्लेस की शानदार दुकानें और इमारतें नजर आती हैं, वहां पहले पेड़-पौधों वाला इलाका और गांव हुआ करते थे. नई राजधानी की योजना के तहत इस जगह को बदलकर एक बड़े कारोबारी केंद्र के रूप में तैयार किया गया.

गोल आकार और सफेद खंभे हैं इसकी शान

कनॉट प्लेस की सबसे खास बात इसकी गोल बनावट और सफेद खंभों वाली इमारतें हैं. इसे अंग्रेजी बनावट की खास तरीके से बनाया गया था. यहां दो गोल घेरे हैं, जिन्हें इनर सर्कल और आउटर सर्कल कहा जाता है. आज इन इलाकों को राजीव चौक और इंदिरा चौक के नाम से भी जाना जाता है. यहां की इमारतों के नीचे दुकानें और ऊपर ऑफिस बनाए गए थे. बड़े रास्तों और खंभों वाले बरामदों के कारण लोग धूप और बारिश से बचते हुए बाजार में घूम सकते थे.

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अंग्रेजों के बाजार से दिल्ली की पसंदीदा जगह तक

शुरुआत में कनॉट प्लेस में बड़े अंग्रेजी स्टोर, होटल और सिनेमा हॉल हुआ करते थे. साल 1932 में खुला रीगल सिनेमा भी इसकी पहचान बन गया था. आजादी के बाद यहां भारतीय कारोबारियों की दुकानें खुलने लगीं. धीरे-धीरे यह जगह बैंक, दफ्तर, रेस्तरां, किताबों की दुकानों और बड़े ब्रांड्स का केंद्र बन गई. आज यहां कॉलेज के छात्र, नौकरी करने वाले लोग, पर्यटक और परिवार सभी घूमने आते हैं. राजीव चौक मेट्रो स्टेशन ने भी कनॉट प्लेस पहुंचना आसान बना दिया है. यही वजह है कि इतने सालों बाद भी इसकी रौनक बनी हुई है.

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से फिर चर्चा में CP

इतिहास और कारोबार के लिए मशहूर कनॉट प्लेस आज राजनीतिक प्रदर्शनों का भी अहम केंद्र बनता जा रहा है. 16 अक्टूबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने यहां के सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन का ऐलान किया. पार्टी अपने नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन करना चाहती है.

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इस प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा बढ़ाई गई और सेंट्रल पार्क को दो दिनों के लिए बंद रखने का फैसला किया गया. वहीं, कनॉट प्लेस के व्यापारियों ने चिंता जताई कि बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से दुकानों और कारोबार पर असर पड़ता है. इस तरह कनॉट प्लेस की कहानी सिर्फ पुरानी इमारतों और बाजार तक सीमित नहीं है. यह बदलते दिल्ली की तस्वीर भी दिखाता है, जहां इतिहास, कारोबार, घूमने-फिरने और लोगों की आवाज उठाने की जगह एक साथ नजर आती है. यही वजह है कि कनॉट प्लेस आज भी दिल्ली के दिल की तरह धड़कता है.

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