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बालोद के 'करकाभाट' ने खींचा दुनिया का ध्यान: 5000 साल पुराने स्मारक देखने दक्षिण कोरिया से पहुंचे शोधकर्ता

बालोद के करकाभाट स्थित 5000 साल पुराने महापाषाण स्मारकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, दक्षिण कोरिया से शोधकर्ता पहुंचे.
इको टूरिज्म के प्रयासों से छत्तीसगढ़ का यह ऐतिहासिक स्थल अब वैश्विक पर्यटन और शोध का केंद्र बनता जा रहा है.

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छत्तीसगढ़ के पर्यटन इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है. बालोद जिले की ऐतिहासिक धरोहर अब सात समंदर पार अपनी चमक बिखेर रही है. ‘बालोद इको टूरिज्म’ के निरंतर प्रयासों का ही सुखद परिणाम है कि बीते 4 मई 2026 को दक्षिण कोरिया के दो विदेशी पर्यटक बालोद के सुप्रसिद्ध महापाषाण कालीन स्थल ‘करकाभाट’ का भ्रमण करने पहुंचे.

महापाषाण काल का रहस्य जानने की उत्सुकता

कोरिया से आए ये पर्यटक साधारण सैलानी नहीं, बल्कि प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों पर गहन शोध (Research) कर रहे शोधकर्ता हैं. उनके लिए करकाभाट का 5000 साल पुराना इतिहास आकर्षण और जिज्ञासा का केंद्र रहा. यहाँ के ऊँचे और विशाल पत्थरों की संरचना को देखकर वे चकित रह गए. पर्यटकों ने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ की यह विरासत वैश्विक स्तर पर शोध के लिए एक बेहतरीन जगह है.

स्थानीय युवाओं ने निभाई ‘ग्लोबल’ गाइड की भूमिका

विदेशी मेहमानों को बालोद की संस्कृति और इतिहास से रूबरू कराने का जिम्मा बालोद इको टूरिज्म के अनुभवी गाइड्स यशकांत गढ़े और टोमेश ठाकुर ने संभाला. उन्होंने न केवल करकाभाट के पत्थरों के पीछे के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्यों को साझा किया, बल्कि छत्तीसगढ़ी खान-पान और लोक परंपराओं की झलक भी पेश की. गाइड्स के बेहतरीन तालमेल और ज्ञान की पर्यटकों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की.

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पर्यटन से बदलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था: सूरज करियारे

बालोद एवं छत्तीसगढ़ इको टूरिज्म के अध्यक्ष श्री सूरज करियारे ने इस दौरे को जिले के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा: “हमारा लक्ष्य केवल पर्यटन को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना है. जब विदेशी पर्यटक यहाँ आएंगे, तो स्थानीय हस्तशिल्प, भोजन और सेवाओं की मांग बढ़ेगी, जिससे सीधे तौर पर हमारे ग्रामीणों को लाभ होगा.”

करकाभाट क्यों है खास?

करकाभाट में स्थित ये पत्थर महापाषाण कालीन (Megalithic) युग के स्मारक माने जाते हैं. पुरातत्वविदों के अनुसार, ये लगभग 3000 से 5000 साल पुराने हैं. इन्हें प्राचीन काल में मृतकों की स्मृति में स्थापित किया जाता था. दुनिया भर में इस तरह के स्थल बहुत कम जगहों पर बचे हैं, यही कारण है कि यह स्थल अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की पहली पसंद बनता जा रहा है.

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भविष्य की राह: ‘दोबारा आएंगे बालोद’

पूरा एक दिन बालोद की गोद में बिताने के बाद कोरियाई पर्यटकों ने यहाँ की शांति और ऐतिहासिक संपन्नता को अद्भुत बताया. उन्होंने जाते-जाते वादा किया कि वे जल्द ही अपनी टीम के साथ दोबारा यहाँ आएंगे.बालोद इको टूरिज्म की इस सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो छत्तीसगढ़ का एक छोटा सा गांव भी दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर बड़ा स्थान बना सकता है.

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