आत्महत्या करना गैरकानूनी ही नहीं अधर्म भी है। शास्त्रों में इसे महापाप की श्रेणी में रखा गया है। अधिकतर लोगों को लगता है कि आत्महत्या के बाद सभी कष्ट और दुखों का अंत हो जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। शास्त्रों के अनुसार आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की आत्मा को परलोक में भी स्थान नहीं मिलता है और उसकी आत्मा दर-दर भटकती रहती है। गरुण पुराण के अनुसार जो भी व्यक्ति जीवन के 7 चक्रों को पूरा करता है, उसे मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं, अगर कोई इनमें से एक भी चक्र अधूरा छोड़ देता है तो उसे अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, भूख से तड़पकर मरना, हिंसा में मरना, फांसी लगाकर जान देना, आग से जलकर मरना, सांप काटने से मृत्यु, जहर पीकर खुद खत्म करना, ये सभी अकाल मृत्यु की श्रेणी में ही आते हैं। मतलब इनकी मृत्यु समय से पहले होती हैं।
महापाप है आत्महत्या
आत्महत्या का शास्त्रों में महापाप की श्रेणी में रखा गया है। गुरुड़ पुराण के प्रेत कांड अध्याय 7 के अनुसार आत्महत्या करने वाले मनुष्य की आत्मा को यमलोक में स्थान नहीं मिलता है। ऐसा व्यक्ति प्रेत योनि को भोगता है। ये सभी आत्माएं पुनर्जन्म मिलने तक तड़पती रहती हैं।
मनुस्मृति के अध्याय 11 श्लोक 80-90 के अनुसार, आत्महत्या करने वाले को अगले जन्म में विकलांगता, मानसिक विकार आदि कष्ट सहना पड़ता है। अगर कोई जल में डूबकर मरता है तो उसे जल वाला कोई जन्तु बनना पड़ता है। वहीं, फांसी लगाकर जान देने वाले को अगले जन्म में सांस संबंधी रोग मिलते हैं।
भगवदगीता के अध्याय 2 के अनुसार भी आत्मा अमर है। जीवन को बलपूर्वक समाप्त करना अधर्म है। जो भी व्यक्ति आत्महत्या करता है, वह अपने कर्मों से बच नहीं सकता है बल्कि अगले जन्म में और अधिक कष्ट भोगता है। योग वशिष्ठ के अनुसार भी अगर कोई व्यक्ति कर्मों को अधूरा छोड़कर मरता है तो उसकी आत्मा बार-बार उन्हीं परिस्थितियों में जन्म लेती है। वह जिस कष्ट से बचने के लिए आत्महत्या करता है, अगले जन्म में उसे इससे बढ़कर कष्ट मिलता है।
कुंडली में भी बनते हैं योग
- चंद्रमा राहु के साथ लग्न, चौथे, 8वें, 12वें भाव में हो तो व्यक्ति डिप्रेशन, अशांति और भ्रम की स्थिति में गलत कदम उठा सकता है।
- जब सूर्य और शनि अत्यधिक पीड़ित होते हैं तो जीवन में निराशा आती है।
- दूसरे और आठवें भाव का नकारात्मक संबंध व्यक्ति को आत्महत्या की ओर प्रेरित कर सकता है।
- अगर केतु नौवें या पांचवें भाव में हो और अशुभ दृष्टि में हो तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में बहुत अकेलापन और निराशा रहती है।
- मंगल राहु या मंगल केतु के साथ खराब स्थिति में हो तो व्यक्ति हिसंक प्रवत्ति का हो सकता है और खुद को नुकसान भी पहुंचा सकता है।
उपाय
- ऐसे व्यक्ति को भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए।
- नियमित रूप से ध्यान और सकारात्मक संगति बनाए रखें।
- हनुमान चालीसा का पाठ करें।
- राहु और केतु दोष को दूर करने के लिए ग्रह शांति कराएं।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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