Tripura Sundari Mandir: आज माघ मास की गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन हैं और आज के दिन देवी त्रिपुर सुंदरी की उपासना की जाती है. यह एक केवल सुखद संयोग है कि आज ही दिन त्रिपुरा राज्य का स्थापना दिवस भी है. कहते हैं, इस राज्य का नाम देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर ही पड़ा है. इस राज्य के उदयपुर शहर में स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर, जिसे माताबाड़ी कहा जाता है, पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. अगरतला से करीब 55 किलोमीटर दूर यह मंदिर न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि इतिहास और परंपरा की कहानी भी कहता है.
51 शक्तिपीठों में है विशेष
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल 51 शक्तिपीठों में शामिल है. कहा जाता है कि देवी सती का दाहिना पैर यहां गिरा था. इसी कारण माता की यहां विशेष पूजा होती है. यहां देवी को त्रिपुर सुंदरी और भगवान शिव को त्रिपुरेश के रूप में पूजा जाता है.
कूर्मा पीठ है यहां की अनोखी पहचान
यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर बना है, जिसकी आकृति कछुए की पीठ जैसी दिखाई देती है. तंत्र परंपरा में इसे कूर्मा पृष्ठ आकृति कहा जाता है. ऐसी रचना को शक्ति साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. इसी वजह से यह स्थान कूर्मा पीठ के नाम से भी जाना जाता है.
गर्भगृह में विराजित हैं दो माताएं
मंदिर के भीतर दो देवी प्रतिमाएं स्थापित हैं. बड़ी प्रतिमा लगभग पांच फीट ऊंची है, जो त्रिपुर सुंदरी की मानी जाती है. वहीं छोटी प्रतिमा को ‘छोटो मा’ कहा जाता है, जो माता चंडी का रूप मानी जाती है. लोककथाओं में कहा जाता है कि त्रिपुर के राजा इस छोटी प्रतिमा को युद्ध और यात्रा में साथ रखते थे.
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सदियों पुराना है राजसी इतिहास
कहते हैं, इस मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 1501 में महाराजा धन्य माणिक्य ने कराया था. जनश्रुति है कि राजा को सपने में देवी ने दर्शन दिए और पहाड़ी पर मंदिर बनाने का निर्देश दिया. उस स्थान पर पहले से विष्णु मंदिर था, जिसे देवी की आज्ञा से यथावत रखा गया. यह घटना शाक्त और वैष्णव परंपरा की एकता को दर्शाती है.
वास्तुकला और पूजा परंपरा
मंदिर बंगाली एक रत्न शैली में बना है. इसकी छत तीन स्तरों में बनी हुई है. यहां देवी को लाल गुड़हल के फूल और पेड़ा चढ़ाने की परंपरा है. पूजा विधि में तंत्र और लोक परंपराओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है.
दिवाली मेला और आस्था की भीड़
हर वर्ष दिवाली के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है. लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. कामाख्या मंदिर के बाद यह क्षेत्र का सबसे अधिक दर्शन किया जाने वाला शक्तिस्थल माना जाता है.
त्रिपुरा की सांस्कृतिक पहचान
माताबाड़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि त्रिपुरा की पहचान मानी जाती है. कई विद्वान मानते हैं कि राज्य का नाम भी त्रिपुर सुंदरी से जुड़ा है. यह मंदिर आज भी आस्था और इतिहास का जीवंत उदाहरण बना हुआ है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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