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Ravidas Jayanti 2026 Date: रविदास जयंती कब है? जानिए ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ से जुड़ी बेमिसाल प्रेरक कथा

Ravidas Jayanti 2026 Date: रविदास जी भारत के महान संत थे, जो जूते बनाने का काम करते हुए भी वे भक्ति में लीन रहते थे. आइए जानते हैं, उनका जन्म दिवस कब है? साथ ही जानते हैं, उनकी प्रसिद्ध कथा 'मन चंगा तो कठौती में गंगा', जो हमें सिखाती है कि अच्छे कर्मों से ईश्वर को पाया जा सकता है.

Ravidas Jayanti 2026 Date: संत रविदास जी काशी (वाराणसी) के रहने वाले थे. मान्यता है कि उनका जन्म माघ पूर्णिमा के दिन सन 1377 ईस्वी हुआ था. इसलिए उनकी जयंती हिन्दू चन्द्र पंचांग के अनुसार माघ पूर्णिमा को मनायी जाती है. यह शुभ दिन इस वर्ष 1 फरवरी, 2026 को पड़ रही है. संत रविदास वे स्वभाव से बहुत ही सरल, दयालु और सच्चे ईश्वर भक्त थे. उनका मुख्य व्यवसाय जूते बनाना था. वे अपना काम पूरी ईमानदारी से करते थे और जो भी समय मिलता, भगवान की भक्ति में लीन रहते थे.

संत रविदास जी कभी भी अपने काम को छोटा नहीं समझते थे और हमेशा कर्म को ही पूजा मानते थे. 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'न संत रविदास जी से संबंधित एक प्रसिद्ध कथा है, जो हमें सिखाती है कि हम जहां हैं, वहीं रहकर अपने अच्छे कर्मों से ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं. आइए जानते हैं, यह कथा विस्तार से…

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'मन चंगा तो कठौती में गंगा' कथा

एक बार पंडित गंगाराम कुछ यात्रियों के साथ हरिद्वार में कुंभ स्नान के लिए जा रहे थे. रास्ते में वे बनारस पहुँचे और वहाँ उनके मन में यह इच्छा हुई कि पहले वे गुरु रविदास से दर्शन करें. उन्होंने गुरु रविदास का निवास स्थान पूछा और गोवर्धनपुर पहुँचकर उनसे भेंट की. गुरु रविदास ने उन्हें बहुत प्रेमपूर्वक स्वागत किया और पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं.

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गंगाराम ने बताया कि वे हरिद्वार जाकर गंगाजी के कुंभ स्नान में शामिल होंगे. गुरु रविदास ने यात्रियों से कहा, “गंगाजी के लिए मेरी ओर से यह कसीरा ले जाना. इसे तब ही दें जब गंगाजी अपने हाथ बाहर निकालें, नहीं तो इसे वैसे ही मत देना.” यात्रियों ने गुरु रविदास की भेंट लेकर हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया.

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कुछ दिनों बाद वे हरिद्वार पहुँचे. गंगा तट पर बहुत भीड़ थी. स्नान करने के बाद गंगाराम ने हाथ जोड़कर कहा, “हे माता गंगाजी, गुरु रविदास की ओर से यह भेंट है. कृपया अपना हाथ बाहर निकालें और इसे स्वीकार करें.” ऐसा कहते ही गंगाजी प्रकट हुईं और हाथ बढ़ाकर कसीरा ले लिया. गंगाजी ने अपने हाथ का एक हीरे जड़ित कंगन गुरु रविदास के लिए भेंट स्वरूप गंगाराम को दिया.

सभी यात्री आश्चर्यचकित रह गए. गंगाजी ने कभी किसी को भेंट नहीं दी थी. पंडित गंगाराम घर लौटकर अपनी पत्नी को सारी घटना सुनाई और कंगन अपनी पत्नी को रख दिया. कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी ने कहा, “इस कंगन को बाजार में बेच दें. इससे अच्छा पैसा मिलेगा और हमारा जीवन सुखी रहेगा.”

गंगाराम कंगन बेचने बाजार गया. लेकिन जो भी सर्राफ कंगन को देखता, वह आश्चर्यचकित हो जाता और कहता, “ऐसा कंगन हमने पहले कभी नहीं देखा.” कंगन की अनोखी कीमत की खबर सिपाही तक पहुँची. सिपाही गंगाराम को पकड़कर राजा के पास ले गए. राजा ने पूछताछ की और गंगाराम ने पूरी कहानी सुनाई कि यह कंगन गंगा माता के हाथ का है, जिसे गुरु रविदास के लिए दिया गया था.

राजा चकित रह गया. उन्होंने गुरु रविदास को बुलाकर राय लेने का निश्चय किया. गुरु रविदास ने कहा, “यह कोई बड़ी बात नहीं है. एक बरतन में गंगा जल डालो, कंगन उसमें रखो और ऊपर से कपड़ा डालकर ढक दो. मन चंगा तो कठौती में गंगा. गंगाजी ही निर्णय करेंगी.”

सभी ने वैसा ही किया. जब कपड़ा हटाया गया, तो दो कंगन बरतन में चमक रहे थे. राजा और दरबार के लोग इसे देखकर प्रसन्न हो गए. गुरु रविदास ने गंगाराम को दोनों कंगन दे दिए.

इस कथा से यह संदेश मिलता है कि अगर मन पवित्र और सच्चा हो, तो साधारण स्थान पर भी असाधारण चमत्कार हो सकता है. जैसे गुरु रविदास ने कहा, “मन चंगा तो कठौती में गंगा.” असली पुण्य और खुशी मन की शुद्धता में ही छिपी होती है, न कि महंगे आभूषण या भौतिक चीज़ों में.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.


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