हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा इस बार आस्था, संस्कृति और दुनिया भर की परंपराओं का अनोखा संगम बनने जा रहा है. 21 से 27 अक्टूबर तक चलने वाले इस सात दिवसीय उत्सव में करीब 12 देशों के कलाकार अपनी कला दिखाएंगे, जबकि 24 देशों की भागीदारी की उम्मीद है. अब तक 346 स्थानीय देवी-देवताओं को उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण भेजा जा चुका है. नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा आयोजन समिति के अध्यक्ष और विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने बताया कि राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता 21 अक्टूबर को उत्सव का शुभारंभ करेंगे. मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू समापन समारोह की अध्यक्षता करेंगे.
ड्रोन शो और विदेशी कलाकार होंगे खास आकर्षण
इस बार थाईलैंड, मिस्र, उज्बेकिस्तान, रूस, कजाकिस्तान और अमेरिका समेत करीब 12 देशों के कलाकार हिस्सा लेंगे. ग्लोबल डांस कार्यक्रम में विदेशी कलाकारों के साथ हिमाचल प्रदेश के लोकनृत्य भी देखने को मिलेंगे. इसके अलावा ड्रोन शो, लेजर शो, खेल प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम उत्सव की रौनक बढ़ाएंगे. आयोजन के दौरान नशामुक्ति अभियान और सरकारी विभागों की प्रदर्शनियां भी लगाई जाएंगी.
कुल्लू दशहरे में क्यों नहीं जलाया जाता रावण का पुतला?
देश के ज्यादातर हिस्सों में विजयादशमी पर रावण का पुतला जलाया जाता है, लेकिन कुल्लू में परंपरा अलग है. यहां दशहरे की शुरुआत विजयादशमी के दिन होती है और उत्सव भगवान रघुनाथ को समर्पित रहता है. इस दौरान रामलीला या रावण के पुतले का दहन नहीं होता. इसके बजाय भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है और अलग-अलग गांवों से आए देवी-देवता ढालपुर मैदान में एकत्र होते हैं. सात दिनों तक देवी-देवताओं के दर्शन के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. इसी वजह से कुल्लू दशहरे को देवताओं का महाकुंभ भी कहा जाता है.
राजा जगत सिंह से जुड़ी है दशहरे की कहानी
स्थानीय मान्यता के अनुसार, 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजा जगत सिंह को एक गरीब ब्राह्मण परिवार की मौत से जुड़ी घटना के बाद गहरा पछतावा हुआ. कहा जाता है कि राजा को गंभीर बीमारी भी हो गई थी. एक संत की सलाह पर उन्होंने अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति कुल्लू मंगवाई और अपना राजपाट भगवान को समर्पित कर दिया. मान्यता है कि इसके बाद राजा की बीमारी ठीक हो गई. वर्ष 1660 में भगवान रघुनाथ की मूर्ति कुल्लू लाई गई और उनके सम्मान में दशहरा उत्सव की परंपरा शुरू हुई. आज भी भगवान रघुनाथ की पूजा और रथयात्रा इस मेले का मुख्य हिस्सा है.
माता हिडिंबा और रथयात्रा का विशेष महत्व
कुल्लू दशहरे में माता हिडिंबा के आगमन को भी खास माना जाता है. उन्हें राजपरिवार की देवी माना जाता है. उत्सव के दौरान भगवान रघुनाथ की रथयात्रा निकाली जाती है. मान्यता के अनुसार, माता भेखली के संकेत के बाद रथयात्रा शुरू होती है. सातवें दिन लंका दहन की रस्म के साथ उत्सव का समापन होता है और भगवान रघुनाथ वापस अपने मंदिर लौटते हैं. कुल्लू दशहरे को 2017 में अंतरराष्ट्रीय उत्सव के रूप में पहचान मिली. इससे पहले भी यह मेला देशभर में प्रसिद्ध था.