Puja Rules: हिंदू धर्म में परिक्रमा, जिसे प्रदक्षिणा भी कहते हैं, एक पवित्र और शक्तिशाली अनुष्ठान है जो भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है। यह प्रथा मंदिरों, घरों और पवित्र स्थानों पर की जाती है। यहां भक्त दक्षिणावर्त (एंटीक्लॉक वाइज) दिशा में देवता की मूर्ति या प्रतीक के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।
शास्त्रों में प्रत्येक देवी-देवता के लिए परिक्रमा की संख्या उनकी प्रकृति और शक्ति के आधार पर निर्धारित की गई है। आइए विष्णु पुराण, शिव पुराण, गणेश पुराण और अन्य शास्त्रों के आधार पर जानते हैं कि किस भगवान की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए और इसका महत्व व लाभ क्या है? वहीं, यदि परिक्रमा मार्ग उपलब्ध न हो तो क्या करें? परिक्रमा न केवल व्यक्ति को भगवान के करीब लाती है, बल्कि मन और शरीर को भी सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
भगवान विष्णु की परिक्रमा
भगवान विष्णु, जो विश्व के पालक और सृष्टि के संतुलनकर्ता हैं। शास्त्रों में उनकी परिक्रमा चार बार करने का विधान है। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, चार परिक्रमा विश्व की चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण का प्रतीक हैं। इससे व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान विष्णु की परिक्रमा से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और भक्त का मन भक्ति और प्रेम में डूब जाता है। यह जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता लाता है।
भगवान शिव की परिक्रमा
भगवान शिव अनंत और सर्वनाशक हैं। भगवान शिव की परिक्रमा को विशेष रूप से अर्ध-परिक्रमा के रूप में किया जाता है। शिव पुराण में कहा गया है कि शिवलिंग की परिक्रमा पूरी नहीं की जाती, क्योंकि शिव की शक्ति अनंत है। पूजा के बाद भगवान शिव की परिक्रमा नंदी के सामने से शुरू करके चंद्रिका (जल निकास) तक जाना चाहिए और फिर वापस लौटना चाहिए। यह अर्ध-परिक्रमा मन को शांत करती है, पापों का नाश करती है, और क्रोध व अहंकार को नियंत्रित करने में मदद करती है।
मां दुर्गा की परिक्रमा
मां दुर्गा शक्ति और साहस की प्रतीक हैं। माता दुर्गा की परिक्रमा तीन बार करने का उल्लेख देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में मिलता है। यह तीन परिक्रमा त्रिगुण सत्व, रज और तम का प्रतीक हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को संतुलित करती हैं। दुर्गा की परिक्रमा से शक्ति, साहस और रक्षा की प्राप्ति होती है। यह परिक्रमा नकारात्मक शक्तियों से बचाव करती है और भक्त के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है।
हनुमान जी की परिक्रमा
हनुमान जी भक्ति, बल और बुद्धि के प्रतीक हैं। प्रभु हनुमान की परिक्रमा पांच बार करने की परंपरा है। रामचरितमानस और हनुमान मंदिरों की प्रथाओं के अनुसार, यह पांच परिक्रमा पंचमहाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का प्रतीक हैं। हनुमान जी की परिक्रमा से शारीरिक और मानसिक बल मिलता है। भय और संकट दूर होते हैं, और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
गणेश जी की परिक्रमा
गणेश जी विघ्नहर्ता और बुद्धि के दाता हैं। भगवान गणेश परिक्रमा तीन बार करने का विधान गणेश पुराण में बताया गया है। यह तीन परिक्रमा बुद्धि, सिद्धि और रिद्धि का प्रतीक हैं। गणेश जी की परिक्रमा से जीवन में विघ्नों का नाश होता है, और नए कार्यों में सफलता मिलती है।
सूर्यदेव की परिक्रमा
सूर्यदेव जीवन और ऊर्जा के स्रोत हैं। इनकी परिक्रमा सात बार करने का उल्लेख सूर्य सिद्धांत और अग्नि पुराण में है। यह सात परिक्रमा सप्त रंगों और सप्त ग्रहों का प्रतीक हैं। सूर्य की परिक्रमा से भक्त को स्वास्थ्य, ऊर्जा और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। यह रोगों से मुक्ति दिलाती है और जीवन में सकारात्मकता लाती है, जिससे भक्त का मन और शरीर स्वस्थ रहता है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए लाभकारी है।
परिक्रमा क्यों करनी चाहिए?
परिक्रमा का महत्व शास्त्रों में गहराई से वर्णित है। विष्णु पुराण के अनुसार, परिक्रमा भक्त को देवता की शक्ति के साथ जोड़ती है और मन को शांत करती है। यह जीवन के चक्र और अनंतता का प्रतीक है। परिक्रमा के दौरान मंत्र जप और एकाग्रता से भक्त का मन केंद्रित होता है, और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, दक्षिणावर्त परिक्रमा पृथ्वी की चुंबकीय ऊर्जा के साथ सामंजस्य स्थापित करती है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। यह भक्ति का एक ऐसा रूप है जो भक्त को आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से समृद्ध करता है।
परिक्रमा के लाभ
परिक्रमा के लाभ अनेक हैं और शास्त्रों में इनका विस्तृत वर्णन मिलता है। पद्म पुराण में परिक्रमा को मोक्ष का साधन बताया गया है, क्योंकि यह भक्त के मन को शुद्ध करती है और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार, परिक्रमा से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रत्येक देवता की परिक्रमा विशिष्ट मनोकामनाओं को पूरा करती है, जैसे गणेश जी की परिक्रमा से विघ्न नाश और हनुमान जी की परिक्रमा से संकट का नाश हो जाता है। यह भक्त के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास लाती है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होता है।
परिक्रमा मार्ग न हो तो क्या करें?
यदि मंदिर में परिक्रमा मार्ग उपलब्ध न हो या भक्त घर पर पूजा कर रहा हो तो कुछ वैकल्पिक उपाय कर सकते हैं। भागवत पुराण के अनुसार आप अपने स्थान पर दक्षिणावर्त दिशा में घूमकर प्रतीकात्मक परिक्रमा कर सकतें है। जिस भगवान की जितनी परिक्रमा का विधान है, आप उतनी बार अपने स्थान पर घूम सकते हैं। घर में पूजा स्थल पर मूर्ति या चित्र के चारों ओर छोटा चक्कर लगाया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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