खबर की मुख्य बातें:
- झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में स्थित हाथी खेदा ठाकुर मंदिर में हाथियों की पूजा की जाती है.
- यह परंपरा लगभग 300 साल पुरानी है, जहां पारंपरिक देवी-देवताओं के बजाय मिट्टी और दूसरी सामग्रियों से बनी हाथियों की प्रतिमाएं पूजी जाती हैं.
- खेदा शब्द का अर्थ हाथियों को भगाना या खदेड़ना है, जो मंदिर के नाम से जुड़ा है.
भारत एक ऐसा देश है जहां पर कई अनोखी परंपराएं देखने को मिलती हैं. धार्मिक जगहों और मंदिरों से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं भी बहुत खास मानी जाती हैं. यह वो देश है जहां पर देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन आज हम आपको झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में मौजूद एक ऐसे मंदिर की कहानी बताएंगे, जहां पर सिर्फ हाथी की पूजा की जाती है. यहां पहुंचने पर आपको किसी पारंपरिक देवी-देवता की मूर्ति के बजाय मिट्टी और दूसरी सामग्रियों से बनी हाथियों की प्रतिमाएं ही नजर आती हैं. यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में हाथियों की पूजा सदियों से की जा रही है और यह परंपरा लगभग 300 साल पुरानी है. आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि इस मंदिर का क्या नाम हैं और क्यों यह परंपरा प्रचलित है.
क्या है इस मंदिर का नाम?
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में मौजूद इस मंदिर का नाम हाथी खेदा ठाकुर मंदिर है. यहां पर मिट्टी के हाथियों की पूजा की जाती है और यह परंपरा 300 साल पुरानी बताई जाती है. अगर हम इसके नाम के अर्थ पर बात करें तो खेदा का मतलब हाथियों को भगाना या खदेड़ना से जोड़ा जाता है.
हाथी और आस्था से जुड़ी है इस मंदिर की कहानी
हाथी खेदा मंदिर की कहानी आसपास के जंगलों और जंगली हाथियों से जुड़ी हुई है. बताया जाता है कि पुराने समय में दलमा क्षेत्र के आसपास जंगली हाथियों का आना-जाना काफी ज्यादा था. हाथियों के झुंड गांवों में पहुंचकर खेतों की फसल को नुकसान पहुंचाते थे, जिससे ग्रामीणों को काफी परेशानी होती थी. इसी समस्या से बचने के लिए मिट्टी के हाथियों की पूजा शुरू की गई. लोगों का विश्वास था कि हाथी खेदा ठाकुर की पूजा करने से जंगली हाथियों का आतंक कम होगा और गांव सेफ रहेंगे.
मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं हाथी की प्रतिमा
इस मंदिर की सबसे खास परंपराओं में से एक है कि अगर किसी इंसान की मन्नत पूरी हो जाती है तो वो इंसान हाथी की प्रतिमा चढ़ाता है. श्रद्धालु अपनी इच्छा पूरी होने पर मिट्टी, धातु या दूसरी सामग्री से बनी हाथी और घोड़े की मूर्ति बनाते हैं और मंदिर के परिसर में रखते हैं. इसके अलावा, मान्या है कि यहां पर लोग नारियल और दूसरी पूजा सामग्री भी चढ़ाते हैं.
फिर देवी-देवताओं की पूजा क्यों नहीं की जाती?
हाथी खेदा ठाकुर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां पूजा की परंपरा पारंपरिक मंदिरों से अलग है. मंदिर में नॉर्मल देवी-देवता की मूर्ति के बजाय हाथी की मूर्ति पूजन की आस्था लोकप्रिय है. यही वजह है कि यह मंदिर स्थानीय लोकआस्था, जंगल और वन्य जीवन से जुड़े विश्वास का एक अनोखा उदाहरण माना जाता है. आप भी इस मंदिर को एक्सप्लोर करने के लिए जा सकते हैं.
प्रसाद को लेकर भी है खास मान्यता
हाथी खेदा मंदिर से जुड़ी परंपराओं में प्रसाद को भी शामिल किया जा सकता है. मान्यता है कि यहां प्रसाद को लेकर खास नियम माने जाते हैं और इस परंपरा के मुताबिक प्रसाद घर ले जाने की परंपरा नहीं है. महिलाओं के प्रसाद ग्रहण करने को लेकर भी स्थानीय मान्यता का उल्लेख मिलता है. हालांकि, ये धार्मिक-सामुदायिक परंपराएं हैं, जिन्हें श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार मानते हैं.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है