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Dashrath Krit Shani Stotra: शनिदेव की कृपा से सभी इच्छाएं होंगी पूरी, आज से ही पढ़ें दशरथ कृत शनि स्तोत्र

Dashrath Krit Shani Stotra: शनिदेव को कर्म, न्याय और संघर्ष का दाता माना जाता है, जिन्हें प्रसन्न करना बहुत मुश्किल है. हालांकि, नियमित रूप से दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करके कोई भी व्यक्ति शनिदेव को खुश कर सकता है. चलिए दशरथ कृत शनि स्तोत्र के महत्व, लिरिक्स और उपायों आदि के बारे में जानते हैं.

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Credit- Social Media

Dashrath Krit Shani Stotra: दशरथ कृत शनि स्तोत्र एक प्रभावशाली स्तुति है, जो कि राजा दशरथ द्वारा शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए रची गई थी. इस स्तोत्र में शनिदेव के भयंकर रूप का बहुत ही स्पष्ट तरीके से वर्णन किया गया है. साथ ही उनसे जाने-अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग नियमित रूप से दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करते हैं, उन्हें शनि दोष, शनि की साढ़ेसाती, शनि की ढैय्या, महादशा और अंतर्दशा आदि का सामना नहीं करना पड़ता है. ऐसे में व्यक्ति हर मुश्किल से बचा रहता है और खुशी से अपना जीवन व्यतीत करता है.

यदि आप भी शनि देव की कृपा से अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं तो रोजाना दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं. यहां पर दशरथ कृत शनि स्तोत्र के सही लिरिक्स दिए गए हैं.

दशरथ कृत शनि स्तोत्र

दशरथ उवाच:

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प्रसन्नो यदि मे सौरे, एकश्चास्तु वरः परः॥
रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन्।
सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी॥
याचितं तु महासौरे, नऽन्यमिच्छाम्यहं।
एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्॥
प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा।
पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र।

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नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:॥1॥
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥3॥
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥5॥
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते॥6॥
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:॥7॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥8॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:॥9॥
प्रसाद कुरु मे सौरे, वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:॥10॥

दशरथ उवाच:

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प्रसन्नो यदि मे सौरे, वरं देहि ममेप्सितम्।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष, पीडा देया न कस्यचित् ॥

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दशरथ कृत शनि स्तोत्र से जुड़े नियम

  • सूर्यास्त से पहले या सूर्योदय के बाद स्तोत्र का पाठ करें.
  • स्पष्ट तरीके से स्तोत्र का उच्चारण करें.
  • पाठ के दौरान मन को शांत रखें.
  • स्नान आदि कार्य करने के बाद ही पाठ करें.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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