माता-पिता और बच्चों के बीच हमेशा से एक अंतर रहा है. हर पीढ़ी, किसी न किसी समय, अपने से पहले वाली पीढ़ी को देखती है और सोचती है, “वे हमें समझते ही नहीं हैं.” यह भावना पुरानी है. नई बात यह है कि हमने इस भावना को नाम देना शुरू कर दिया है. आज, बेबी बूमर्स, जेनरेशन X, मिलेनियल्स, जेन Z और जेन अल्फा रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गए हैं. हम ये शब्द अख़बारों, विज्ञापनों, राजनीतिक चर्चाओं, दफ़्तरों और सोशल मीडिया पर सुनते हैं. किसी को “बहुत ज़्यादा मिलेनियल” कहा जाता है, तो कोई “बहुत जेन Z” होता है, और स्क्रीन के साथ बड़े हो रहे बच्चों को आसानी से “जेन अल्फा” कह दिया जाता है, मानो यह लेबल ही उन्हें पूरी तरह समझा देता हो. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमने पीढ़ियों के नाम रखना कब शुरू किया और अचानक हमें ऐसा करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
इंसानी इतिहास के ज़्यादातर समय में, समाज को साफ़-सुथरे पीढ़ीगत खानों में बांटने की कोई खास वजह नहीं थी. बेशक, माता-पिता और बच्चे अलग-अलग थे. युवाओं के अपने फ़ैशन, तर्क, महत्वाकांक्षाएं और बगावतें थीं, लेकिन जिस दुनिया में कोई बच्चा बड़ा होता था, वह अक्सर वैसी ही होती थी जैसी उसके माता-पिता ने देखी थी. हो सकता है कि किसान के बेटे के पास अपने पिता से बेहतर औज़ार हों. हो सकता है कि कोई व्यापारी ज़्यादा दूर तक यात्रा करे. हो सकता है कि किसी युवा के राजनीतिक विचार बहुत अलग हों. फिर भी, ज़िंदगी की बुनियादी रफ़्तार जानी-पहचानी बनी रही. परिवार, पेशे, समुदाय, भाषा और सामाजिक रीति-रिवाज़ बदलते थे, लेकिन आमतौर पर धीरे-धीरे; इसलिए पीढ़ीगत अंतर तो था, लेकिन उसे किसी लेबल की ज़रूरत नहीं थी.
यह तब बदलना शुरू हुआ जब आधुनिक दुनिया तेज़ी से बदलने लगी. औद्योगीकरण, शहरों का विकास, बड़े पैमाने पर शिक्षा, अख़बार, रेडियो, सिनेमा और आख़िरकार टेलीविज़न का मतलब था कि लाखों लोग लगभग एक ही उम्र में एक जैसी घटनाओं और तकनीकों का अनुभव कर सकते थे, और 20वीं सदी ने इसे और भी साफ़ कर दिया. दो विश्व युद्ध, महामंदी, आर्थिक विस्तार, राजनीतिक आंदोलन और बड़े पैमाने पर उपभोक्ता संस्कृति ने उन लोगों पर गहरी छाप छोड़ी जिन्होंने उन्हें जिया था. एक ही समय में पैदा हुए लोग अब उम्र के अलावा और भी बहुत कुछ साझा कर सकते थे, और फिर सदी की सबसे बड़ी जनसांख्यिकीय घटनाओं में से एक घटना घटी.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद, कई पश्चिमी देशों में जन्म दर में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई. सैनिक घर लौटे, परिवार बने और बड़ी संख्या में बच्चे पैदा हुए. इसे “बेबी बूम” कहा गया, और इस दौरान पैदा हुए बच्चों को “बेबी बूमर्स” कहा जाने लगा. शुरुआत में यह नाम बहुत ही सीधा-सादा था क्योंकि बहुत सारे बच्चे पैदा हुए थे. आम तौर पर बेबी बूमर्स का समय 1946 से 1964 के बीच माना जाता है, हालांकि देश और इस्तेमाल की जा रही परिभाषा के आधार पर सही साल अलग-अलग हो सकते हैं. उनकी खासियत सिर्फ़ यह नहीं थी कि वे युद्ध के बाद पैदा हुए थे, बल्कि यह थी कि वे आबादी का एक बहुत बड़ा समूह बन गए थे और जैसे-जैसे यह समूह बड़ा हुआ, इसके आकार ने इसे बहुत ज़्यादा सांस्कृतिक महत्व दिया. ये बच्चे उस दुनिया के थे जिसे फिर से बनाया जा रहा था. उनमें से कई आर्थिक विकास, टेलीविज़न के प्रसार, बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति, उच्च शिक्षा के विस्तार और बड़े सामाजिक आंदोलनों के दौर में बड़े हुए. 1960 और 1970 के दशक तक, उनमें से कई युवा वयस्क बन चुके थे और अपनी पिछली पीढ़ी के नज़रिए और संस्थाओं पर सवाल उठा रहे थे. नागरिक अधिकार, युद्ध-विरोधी विरोध-प्रदर्शन, लिंग के बारे में बदलते विचार, नया संगीत और युवा संस्कृति – ये सभी उस दौर का हिस्सा बन गए. पहली बार, एक पीढ़ी ऐसी बन रही थी जिसे लोग साफ़ तौर पर देख सकते थे.
बेबी बूमर्स ने पीढ़ी का विचार ईजाद नहीं किया, लेकिन उन्होंने एक नाम वाली पीढ़ी के विचार को और ज़्यादा उपयोगी बनाने में मदद की. अब लोगों का एक बहुत बड़ा समूह था जिनका बचपन, जवानी और शुरुआती वयस्क जीवन ऐतिहासिक अनुभवों के एक पहचाने जाने योग्य समूह से आकार ले चुका था और यहीं पर एक छोटा सा फ़र्क समझना मददगार होता है. एक ‘कोहोर्ट’ (समूह) और पीढ़ी का लेबल एक ही चीज़ नहीं हैं. कोहोर्ट बस लोगों का एक ऐसा समूह होता है जिनमें कुछ समानता होती है, जैसे जन्म का समय या कोई बड़ा अनुभव. लेबल वह नाम है जो हम उस समूह को देते हैं.
युद्ध के बाद के बेबी बूम के दौरान पैदा हुए लोगों ने एक कोहोर्ट बनाया, चाहे उन्हें किसी ने बेबी बूमर्स कहा हो या नहीं. यह नाम बाद में आया. यही बात ‘जेन ज़ेड’ (Gen Z) के बारे में भी सच है. एक खास समय में पैदा हुए लोग तब भी एक ‘बर्थ कोहोर्ट’ (जन्म-समूह) ही होते, भले ही “जेन ज़ेड” शब्द कभी चलन में न आया होता. फिर आई ‘जेनरेशन X’.
‘जेनरेशन X’ की कहानी थोड़ी अलग है क्योंकि ‘X’ अक्षर का मतलब ही अनिश्चितता से जुड़ा था. फ़ोटोग्राफ़र और लेखक रॉबर्ट कापा ने 1950 के दशक की शुरुआत में दूसरे विश्व युद्ध के बाद बड़े हो रहे युवाओं पर एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में ‘जेनरेशन X’ शब्द का इस्तेमाल किया था. बाद में यह शब्द ब्रिटिश युवा संस्कृति में भी दिखाई दिया. 1964 में, जेन डेवरसन और चार्ल्स हैम्बलेट ने ‘जेनरेशन X’ नाम की एक किताब पब्लिश की, जो ऐसे ब्रिटिश युवाओं के बारे में थी जिनका व्यवहार और नज़रिया उनके माता-पिता से अलग था. इसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान 1991 में मिली, जब कनाडाई लेखक डगलस कूपलैंड ने ‘जेनरेशन X: टेल्स फ़ॉर एन एक्सेलरेटेड कल्चर’ किताब पब्लिश की. इस किताब ने तेज़ी से बदलते और कंज्यूमर-ड्रिवन समाज में बड़े हो रहे युवाओं के मूड को दिखाया, और जल्द ही ‘जेनरेशन X’ सिर्फ़ एक किताब का टाइटल नहीं रह गया. यह एक खास तरह के युवाओं को बताने का ज़रिया बन गया. यह एक बड़ा बदलाव था कि एक पीढ़ी अब सिर्फ़ कुछ खास सालों में पैदा हुए लोगों का समूह नहीं रह गई थी. लोगों की सोच में उसकी अपनी एक पहचान बनने लगी थी. जब ‘जेनरेशन X’ (Generation X) नाम आम हो गया, तो अगली पीढ़ी को स्वाभाविक रूप से ‘जेनरेशन Y’ (Generation Y) कहा जाने लगा. लेकिन यह नाम उस तरह से कभी लोकप्रिय नहीं हो पाया. 1980 और 1990 के दशक के आसपास पैदा हुए लोग ‘मिलेनियल्स’ (Millennials) के तौर पर ज़्यादा जाने गए, क्योंकि वे नई सदी (मिलेनियम) की शुरुआत के समय बड़े हो रहे थे.
फिर आई ‘जेनरेशन Z’ (Generation Z).
‘जेनरेशन X’ के उलट, ऐसा कोई एक व्यक्ति नहीं था जिसने घोषणा की हो कि अगली पीढ़ी को अब आधिकारिक तौर पर ‘जेनरेशन Z’ कहा जाएगा. यह नाम डेमोग्राफिक (जनसांख्यिकीय) लेखों, मीडिया के इस्तेमाल और पॉपुलर कल्चर के ज़रिए प्रचलित हुआ; यह X और Y के बाद वर्णमाला (alphabet) के क्रम में था और सरल था – X, Y, Z – और यह नाम चल पड़ा. 2000 और 2010 के दशक तक, ‘जेनरेशन Z’ एक जाना-पहचाना शब्द बन गया था. लोग युवाओं को सिर्फ़ उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उस खास दुनिया से समझना चाहते थे जिसमें वे बड़े हुए थे. फिर हमारे पास अक्षर खत्म हो गए, क्योंकि Z के बाद अगली पीढ़ी को क्या कहा जाए? इसका जवाब ‘जेनरेशन A’ नहीं था. डेमोग्राफर मार्क मैकक्रिंडल (Mark McCrindle) ने इसके बजाय ग्रीक वर्णमाला का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया, जिसकी शुरुआत ‘अल्फा’ (Alpha) से होती है. इस तरह हमें ‘जेनरेशन अल्फा’ मिली, जिसके बाद बीटा, गामा और डेल्टा आए. इसे इस तरह कहने पर यह थोड़ा मज़ेदार लगता है. लेकिन इसमें कुछ ऐसी बात है जो बहुत कुछ बताती है. तब तक, पीढ़ियों के नाम रखना इतना आम हो गया था कि हम पीढ़ियों का वर्णन सिर्फ़ उनके बड़े होने के बाद नहीं करते थे. हम बच्चों के दौर में ही पीढ़ियों के नाम रखने लगे थे.
हमें इन लेबल्स (नामों) की ज़रूरत ही क्यों पड़ी?
बड़ा बदलाव यह नहीं था कि लोग अचानक उम्र को लेकर बहुत ज़्यादा सोचने लगे थे. बल्कि, बड़े होने का अनुभव ही बदलने लगा था. बीस साल के अंतर वाले तीन लोगों के बारे में सोचिए. सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति शायद चिट्ठियों, लैंडलाइन फ़ोन और घर में एक टेलीविज़न के साथ बड़ा हुआ हो. अगला व्यक्ति शायद कंप्यूटर और शुरुआती इंटरनेट के दौर में बड़ा हुआ हो. सबसे कम उम्र का व्यक्ति शायद स्मार्टफ़ोन, YouTube, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ बड़ा हुआ हो. वे सिर्फ़ उम्र में ही अलग नहीं हैं. “सामान्य” होने का मतलब क्या है, इस बारे में उनकी सोच बिल्कुल अलग हो सकती है और यहीं पर पीढ़ी के अंतर (जेनरेशन गैप) ने एक दिलचस्प मोड़ लिया है. जैविक पीढ़ी अचानक छोटी नहीं हो गई है. लोग अभी भी लगभग उसी समय-सीमा में बड़े होते हैं, वयस्क बनते हैं और बच्चे पैदा करते हैं. लेकिन लोगों के बीच सांस्कृतिक दूरी अब बहुत कम लग सकती है. पहले, 15 या 20 साल का अंतर एक स्पष्ट सांस्कृतिक अंतर पैदा कर सकता था. आज, कभी-कभी पांच या दस साल का अंतर भी चौंकाने वाला हो सकता है. 1990 के दशक के आखिर में पैदा हुए किसी व्यक्ति को स्मार्टफोन के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने से पहले का बचपन याद हो सकता है. कुछ साल बाद पैदा हुआ कोई व्यक्ति शायद स्मार्टफोन के बीच ही बड़ा हुआ हो. एक व्यक्ति को इंटरनेट की खोज याद है, दूसरे को इंटरनेट का बस पहले से मौजूद होना याद है, और हम महसूस कर सकते हैं कि यह अंतर जरूरी नहीं कि बुद्धिमत्ता, मूल्यों या व्यक्तित्व का हो, बल्कि अनुभव का है और शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है.
टेक्नोलॉजी एक तरह की पीढ़ी बनाने वाली मशीन बन गई है
रेडियो वाली पीढ़ी टेलीविज़न वाली पीढ़ी से अलग थी; टेलीविज़न वाली पीढ़ी इंटरनेट वाली पीढ़ी से अलग थी, इंटरनेट वाली पीढ़ी स्मार्टफोन वाली पीढ़ी से अलग थी और अब स्मार्टफोन वाली पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ बड़ी हो रही है. इनमें से हर टेक्नोलॉजी हमारे बातचीत करने के तरीके से कहीं ज्यादा कुछ बदलती है. यह हमारे सीखने, याद रखने, काम करने, मनोरंजन करने और दूरी को समझने के तरीके को बदलती है. Google के आने से पहले बड़े हुए व्यक्ति का जानकारी के साथ रिश्ता उस व्यक्ति से बहुत अलग होता है जिसने कभी इंस्टेंट सर्च के बिना दुनिया नहीं देखी. AI के साथ बड़ा होने वाले बच्चे की लिखने, कुछ बनाने, रिसर्च करने या किसी समस्या को हल करने के बारे में सोच बहुत अलग हो सकती है और यही एक कारण है कि ये लेबल उपयोगी हो गए हैं और ये हमें बड़े सामाजिक बदलावों के बारे में बात करने का एक शॉर्टकट देते हैं.
अगर रिसर्चर यह समझना चाहते हैं कि मंदी ने युवाओं को कैसे प्रभावित किया, सोशल मीडिया ने राजनीतिक भागीदारी को कैसे बदला, स्मार्टफोन ने बचपन को कैसे बदला या AI शिक्षा को कैसे बदल सकता है, तो उन्हें उन लोगों को एक समूह में रखने का तरीका चाहिए जो मोटे तौर पर एक जैसे हालात में बड़े हुए हैं. पीढ़ीगत लेबल इसमें मदद करते हैं, लेकिन इसमें एक पेंच भी है. जो लेबल हमें बड़े पैटर्न देखने में मदद करते हैं, वे हमें आलसी सोच वाला भी बना सकते हैं. हम ऐसी बातें कहने लगते हैं जैसे, “मिलेनियल्स को सब कुछ आसानी से चाहिए होता है”, “बूमर्स टेक्नोलॉजी नहीं समझते”, “जेन Z का ध्यान ज़्यादा देर तक नहीं टिकता” या “जेन अल्फा को स्क्रीन की लत है.” ये बातें सुनने में अच्छी लगती हैं क्योंकि ये मुश्किल सामाजिक बदलावों को एक आसान वाक्य में समेट देती हैं. लेकिन असल में लोग इतने सीधे नहीं होते. दिल्ली में बड़ा होने वाला कोई युवा, भारत के किसी छोटे शहर में बड़ा होने वाला कोई और, और दुनिया के किसी दूसरे कोने में बड़ा होने वाला कोई व्यक्ति—ये सभी भले ही तकनीकी रूप से जेन Z या जेन अल्फा का हिस्सा हों, लेकिन उनकी ज़िंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकती है. यहीं पर इनकम, परिवार, शिक्षा, जगह और संस्कृति जैसी चीज़ें मायने रखती हैं. फिर भी, ये लेबल बहुत असरदार हो गए हैं क्योंकि अब ये सिर्फ़ हमारी पहचान नहीं रह गए हैं.
डिस्क्लेमर – लेखक ललित सिहाग जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं, वह रिसर्चर हैं और वर्तमान में नीति एवं राजनीति पर लिखते हैं. लेख में साझा किए गए तथ्य लेखक के निजी विचार हैं.