ASEFJS15 Bangkok: बदलती पत्रकारिता में एक जर्नलिस्ट को किन चीजों की करनी चाहिए रक्षा?
पत्रकारिता का भविष्य सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि हम बदलावों के साथ कितनी तेजी से खुद को ढालते हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि हम जनता का भरोसा लगातार जीतने में कितने सफल होते हैं.
एक पत्रकार के लिए सबसे मुश्किल काम यह पता लगाना होता था कि क्या नकली है. (Photo: News24)
बैंककॉक में आयोजित 15वें एशिया-यूरोप फाउंडेशन जर्नलिस्ट्स सेमिनार में भारत का प्रतिनिधित्व करने मैं सितंबर में थाईलैंड पहुंची थी. चार दिनों के कार्यक्रम के दौरान, एशिया और यूरोप के 20 देशों के 22 पत्रकारों ने पत्रकारिता की बदलती वास्तविकताओं पर चर्चा की. इसमें AI से मिलने वाली गलत जानकारी और जनता का घटता भरोसा, पत्रकारों को मिलने वाली धमकियां, और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताएं जैसे विषय शामिल थे. हमारी चर्चाओं से निकले 5 मुख्य निष्कर्ष यहां दिए गए हैं.
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लंबे समय तक, एक पत्रकार के लिए सबसे मुश्किल काम यह पता लगाना होता था कि क्या नकली है. अब, जब हर जगह AI से बना कंटेंट मौजूद हैं, तो अब कहीं ज़्यादा मुश्किल काम यह साबित करना हो गया है कि क्या असली है.
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मैं अपना दिन सवाल पूछने, जटिल खबरों को आसान भाषा में समझाने और दर्शकों को समाचारों का सही अर्थ समझने में मदद करने में बिताती हूं. News24 पर अपने कार्यक्रम ‘रिमझिम के 5 पॉइंट्स’ के जरिए मैं खबरों का संदर्भ बताने और यह समझाने की कोशिश करती हूं कि कोई खबर क्यों महत्वपूर्ण है? लेकिन पत्रकारिता के भविष्य को लेकर मेरे मन में हर दिन कई सवाल उठते हैं. बैंकॉक में आयोजित सेमिनार के दौरान मुझे एहसास हुआ कि एशिया और यूरोप के दूसरे पत्रकार भी ऐसी ही कई चिंताओं से जूझ रहे हैं.
जैसे-
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जब खबरें बताने में मदद करने वाली तकनीक गलत सूचनाएं फैलाना भी आसान बना दे, तो क्या होगा?
जब पत्रकारों को उनकी खबरों के कारण दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करना पड़े, तो क्या होगा?
जब ज्यादा व्यूज पाने और तेजी से खबर देने की होड़ सच्चाई की पुष्टि करने की जिम्मेदारी से टकराने लगे, तो क्या होगा?
यहां 14 से 17 सितंबर, 2026 तक आयोजित 15वें एशिया-यूरोप फाउंडेशन जर्नलिस्ट्स सेमिनार से मिली पांच प्रमुख सीख प्रस्तुत हैं। इस वर्ष सेमिनार का विषय था, ‘अस्थिर दुनिया में पत्रकारिता की मजबूती’. एशिया-यूरोप फाउंडेशन (ASEF) ने थाईलैंड के विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर इस सेमिनार का आयोजन किया. इसमें तकनीक, भरोसे, सुरक्षा और पत्रकारिता के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए एक साझा मंच तैयार किया गया.
भू-राजनीति से लेकर जनता के भरोसे तक का सवाल
थाईलैंड के फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब के अध्यक्ष और रॉयटर्स के वरिष्ठ इंडोचाइना संवाददाता पानु वोंगचा-उम ने अंतरराष्ट्रीय मामलों की रिपोर्टिंग में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की. इनमें जानकारी तक सीमित पहुंच, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं, भाषा की बाधाएं, दावों की पुष्टि करने में कठिनाइयां और सरकारों की ओर से जानकारी रोके जाने की आशंकाएं शामिल हैं.
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी खबर में दोनों पक्षों को जगह देना हमेशा निष्पक्षता का प्रतीक होता है? जब संगठित तरीके से गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हों, तो विरोधी दावों को समान महत्व देना दर्शकों को जानकारी देने के बजाय गुमराह कर सकता है. इसके बाद मीडिया प्रशिक्षक ऑगस्टीन एंथुवन ने जनता के भरोसे, खबरों से होने वाली थकान और ध्रुवीकरण के मुद्दों पर चर्चा की. सुर्खियों, तस्वीरों और प्रभाव डालने वाली भाषा से जुड़े अभ्यासों के जरिए हमने देखा कि किसी खबर को प्रस्तुत करने का तरीका लोगों की धारणा को कितनी आसानी से प्रभावित कर सकता है.
लगातार नकारात्मक खबरों से घिरे दर्शकों को सिर्फ डर और चिंता पैदा करने वाली रिपोर्टिंग की जरूरत नहीं है. उन्हें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो समाधान की दिशा दिखाए और झूठी उम्मीद जगाने के बजाय ईमानदारी से आशा का संचार करे.
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AI बदल रहा है पत्रकारिता का स्वरूप, लेकिन तथ्यों की पुष्टि जरूरी
न्यूजरूम.एआई के जेनी रोमानो और पेड्रो हेनरिक्स ने फैक्ट की पुष्टि करने की व्यावहारिक तकनीकों के बारे में बताया. इनमें रिवर्स इमेज सर्च और किसी जानकारी के मूल सोर्स का पता लगाना शामिल था. असली तस्वीरों और वीडियो को भ्रामक कैप्शन के साथ प्रसारित किया जा सकता है. वहीं, वास्तविक सबूतों को भी AI से तैयार बताकर खारिज किया जा सकता है. न्यूजरूम में AI के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश होने चाहिए. साथ ही, जानकारी तैयार करने की प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका के बारे में पारदर्शिता बनाए रखना भी जरूरी है.
पत्रकारों की सुरक्षा सिर्फ घटनास्थल तक सीमित नहीं
पत्रकारों की सुरक्षा पर आयोजित सत्र में चुलालोंगकॉर्न विश्वविद्यालय के जेसाडा सलाथोंग, थाईलैंड-म्यांमार मामलों की विशेषज्ञ ओनरावी टैंगमीसांग, अल जजीरा के टोनी चेंग और थाई पीबीएस के पोंगसाथत सुकफोंग शामिल हुए. उन्होंने थाईलैंड-म्यांमार सीमा और संघर्ष वाले क्षेत्रों में रिपोर्टिंग के अपने अनुभवों के आधार पर शारीरिक, डिजिटल, कानूनी और आर्थिक जोखिमों का जिक्र किया.
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खतरे तब खत्म नहीं होते, जब पत्रकार घटनास्थल से लौट आते हैं. उनकी डिजिटल गतिविधियों से जुड़ी जानकारियां लंबे समय बाद भी उन्हें जोखिम में डाल सकती हैं. स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के पास अक्सर सुरक्षा उपकरणों, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग की कमी होती है.
सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड ट्रॉमा एशिया पैसिफिक के अमंथा परेरा ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सत्र का नेतृत्व किया. इसमें ऑनलाइन ट्रोलिंग, धमकियों, पीछा किए जाने, हिंसक तस्वीरों और वीडियो के संपर्क में रहने और हमेशा ऑनलाइन रहने के कारण काम और निजी जीवन के बीच मिटती सीमा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
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सीमाओं के पार एक-दूसरे से क्या सीख सकते हैं पत्रकार?
इस सेमिनार में थाईलैंड के फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब में ‘रिपोर्टिंग साउथईस्ट एशिया टुडे’ विषय पर एक सार्वजनिक पैनल चर्चा भी हुई. इसमें रॉयटर्स, निक्केई एशिया और द स्ट्रेट्स टाइम्स के पत्रकार शामिल हुए. एशिया-यूरोप फाउंडेशन 1998 से इस सेमिनार का आयोजन कर रहा है. इस वर्ष इसे कोनराड-एडेनॉयर-स्टिफ्टुंग और थाईलैंड के विदेश मंत्रालय का भी सहयोग मिला.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव साझा करने का वास्तविक महत्व इस बात में है कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन अनुभवों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है. भारत में गलत सूचनाओं पर काम करने वाला पत्रकार यूरोप के किसी सहयोगी से सीख सकता है. इसी तरह, ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना कर रहा पत्रकार दूसरे देशों में अपनाए जा रहे तरीकों से मदद ले सकता है.
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वे सवाल, जिन्हें हमें लगातार पूछते रहना चाहिए
बैंकॉक से लौटते समय मुझे सबसे बड़ी सीख किसी खास तकनीक के बारे में नहीं मिली. यह सीख जिम्मेदारी से जुड़ी थी. आज कोई भी व्यक्ति सामग्री प्रकाशित कर सकता है, AI कंटेंट तैयार कर सकता है और एल्गोरिदम उसे असाधारण तेजी से लोगों तक पहुंचा सकते हैं. लेकिन मशीनें और आंकड़ों पर आधारित मापदंड संपादकीय विवेक, विश्वसनीयता और भरोसा पैदा नहीं कर सकते.
आखिर में पत्रकारिता का भविष्य सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि हम बदलावों के साथ कितनी तेजी से खुद को ढालते हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि हम जनता का भरोसा लगातार जीतने में कितने सफल होते हैं.