संयुक्त राष्ट्र कमजोर हो रहा है तो दुनिया किसके हाथ में जाएगी?

दुनिया में जब कोई बड़ा संकट आता है तो निगाहें एक ऐसी संस्था की ओर जाती हैं, जिसका जन्म ही युद्ध की राख से हुआ था. संयुक्त राष्ट्र या यूनाइटेड नेशन इसलिए बनाया गया था कि दुनिया के बड़े देश अपनी ताकत के दम पर अकेले सब कुछ तय न करें, बल्कि विवादों का समाधान बातचीत और नियमों के रास्ते निकले.

United Nation

सितंबर 2026 में हुई संयुक्त राष्ट्र महासभा की 81वीं बैठक का विषय क्या है? (Photo: AI)

दुनिया में जब कोई बड़ा संकट आता है तो निगाहें एक ऐसी संस्था की ओर जाती हैं, जिसका जन्म ही युद्ध की राख से हुआ था. संयुक्त राष्ट्र या यूनाइटेड नेशन इसलिए बनाया गया था कि दुनिया के बड़े देश अपनी ताकत के दम पर अकेले सब कुछ तय न करें, बल्कि विवादों का समाधान बातचीत और नियमों के रास्ते निकले. लेकिन आज, करीब आठ दशक बाद, उसी संस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल उसकी मौजूदगी का नहीं, उसकी प्रभावशीलता का है.

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सितंबर 2026 में हुई संयुक्त राष्ट्र महासभा की 81वीं बैठक का विषय ही था, “भरोसा बहाल करना, बदलाव को संभालना और ऐसा संयुक्त राष्ट्र बनाना जो सभी के लिए काम करे.” 22 से 28 सितंबर तक चली महासभा में दुनिया के नेता एक बार फिर युद्ध, जलवायु परिवर्तन, असमानता, तकनीक और वैश्विक व्यवस्था पर चर्चा के लिए जुटे. लेकिन इस बार चर्चा के बीच एक बेचैनी साफ दिखाई दी कि दुनिया को संयुक्त राष्ट्र की जरूरत पहले से ज्यादा है, लेकिन दुनिया का एक बड़ा हिस्सा यह भी पूछ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र आज की दुनिया की समस्याओं का जवाब देने में सक्षम है.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने अपने शुरुआती भाषण में कहा कि दुनिया के लोग यह नहीं पूछ रहे कि संयुक्त राष्ट्र अभी मौजूद है या नहीं, बल्कि यह पूछ रहे हैं कि क्या वह काम करता है. यह कोई साधारण वाक्य नहीं है, इसके भीतर आज की वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा संकट छिपा है.

संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी सुरक्षा परिषद में दिखाई देती है. इसकी स्थायी सदस्यता आज भी अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस के पास है. इन पांच देशों को शुरू से वीटो का अधिकार मिला हुआ है. 1945 में जब यह व्यवस्था बनी थी तब दुनिया की ताकत का संतुलन अलग था लेकिन आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का आर्थिक और राजनीतिक महत्व बहुत बढ़ चुका है और दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्था में उनका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष ने विशेष रूप से कहा कि अफ्रीका को सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व से बाहर रखना अब उचित नहीं है. उनका कहना था कि अफ्रीका को फैसले लेने वाली मेज पर होना चाहिए, केवल उन फैसलों का विषय नहीं और यही बात भारत पर भी लागू होती है.

भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में उसकी भूमिका लगातार बढ़ी है लेकिन फिर भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में भारत की कोई जगह नहीं है और यह केवल भारत के सम्मान या प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है बल्कि असली सवाल यह है कि जिस दुनिया में शक्ति का संतुलन बदल चुका है, उसकी संस्थाएं कब बदलेंगी?

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एक बात समझना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र की समस्या सिर्फ यह नहीं है कि भारत को स्थायी सीट नहीं मिली. समस्या इससे बड़ी है कि अगर दुनिया की यूनाइटेड नेशन  संस्थाएं बदलती वास्तविकताओं को जगह नहीं देतीं तो उनकी विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर होती है.

हाल की महासभा में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने दुनिया के सामने चार बड़े परीक्षण बताए, युद्ध और शांति, असमानता, जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस. उनका कहना था कि इन चुनौतियों से निपटने का तरीका तय करेगा कि दुनिया सहयोग की ओर जाएगी या और ज्यादा विभाजन की ओर. इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मुद्दा सबसे नया है. कुछ वर्ष पहले तक AI को तकनीकी कंपनियों का विषय माना जाता था लेकिन आज यह देशों की शक्ति का विषय बन चुका है. जिसके पास बेहतर AI, ज्यादा डेटा और ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता होगी, उसके पास अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, सूचना और भविष्य की तकनीक पर अधिक प्रभाव होगा.

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महासभा में इस बात पर जोर दिया गया कि AI की दिशा कुछ देशों और कंपनियों के हाथ में सीमित नहीं होनी चाहिए. सवाल यह है कि AI कौन बनाएगा, उसका लाभ किसे मिलेगा, उससे होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा और उसके नियम कौन बनाएगा. संयुक्त राष्ट्र ने अगले साल होने वाले “एआई गवर्नेंस पर ग्लोबल संवाद” की दिशा में भी काम आगे बढ़ाया है. यहीं से संयुक्त राष्ट्र के सामने एक नया अवसर भी पैदा होता है कि अगर वह AI, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, महामारी और दूसरे सीमा-पार संकटों पर साझा नियम बनाने का प्रभावी मंच बनता है तो उसकी भूमिका कम नहीं, बल्कि और बढ़ सकती है लेकिन अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो दुनिया के नियम धीरे-धीरे उन देशों और कंपनियों द्वारा तय किए जा सकते हैं जिनके पास सबसे ज्यादा पैसा, तकनीक और सैन्य ताकत है.

यही वह बिंदु है जहां मूल सवाल सामने आता है कि अगर संयुक्त राष्ट्र कमजोर होता गया तो दुनिया किसके हाथ में जाएगी? और इसका जवाब किसी एक देश का नाम नहीं है क्योंकि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही. अमेरिका की ताकत बनी हुई है, चीन का प्रभाव बढ़ा है, यूरोप अपनी भूमिका तलाश रहा है, भारत का वजन बढ़ रहा है और रूस अब भी सुरक्षा तथा ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है. साथ ही ब्रिक्स, जी 20, आसियान और अफ्रीकी संघ जैसे मंचों की भूमिका भी बढ़ी है. दुनिया कई शक्ति-केंद्रों की ओर बढ़ रही है.

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बहुध्रुवीयता अपने आप में समस्या नहीं है बल्कि समस्या तब पैदा होती है जब कई शक्तियां तो हों, लेकिन उनके बीच साझा नियम कमजोर पड़ जाएं. ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय राजनीति बातचीत और कानून से ज्यादा ताकत और प्रभाव के आधार पर चलने लगती है.

सितंबर में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत को इस बदलती व्यवस्था में अपनी भूमिका दिखाने का एक बड़ा अवसर दिया. ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र में सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र और विशेष रूप से सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की जरूरत दोहराई. इसमें विकासशील देशों, खासकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका को वैश्विक निर्णयों में ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई. घोषणापत्र में भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का भी समर्थन किया गया.

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यह भारत के लिए केवल कूटनीतिक समर्थन जुटाने का विषय नहीं होना चाहिए. भारत के पास अब दो अलग-अलग मंचों को जोड़ने का अवसर है. एक तरफ ब्रिक्स है, जहां विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज मजबूत की जा सकती है और दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र है, जहां वैश्विक नियम और संस्थागत व्यवस्था तय होती है और भारत की भूमिका इन दोनों के बीच पुल बनाने की हो सकती है.

भारत को यह दिखाना होगा कि बहुध्रुवीय दुनिया का अर्थ केवल पश्चिम के सामने एक नया गुट खड़ा करना नहीं है बल्कि इसका अर्थ ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें अधिक देशों की आवाज सुनी जाए और वैश्विक फैसलों में अधिक प्रतिनिधित्व हो.

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भारत ने सुरक्षा परिषद सुधार के लिए जी4 यानी भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर लगातार प्रयास किए हैं. मई 2026 में G4 की ओर से भारत ने फिर कहा कि सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार होना चाहिए और सुधार की प्रक्रिया को केवल बयानबाजी से आगे ले जाकर ठोस बातचीत की दिशा में बढ़ना चाहिए लेकिन भारत की भूमिका केवल अपनी स्थायी सीट हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि भारत को तीन मोर्चों पर ठोस पहल करनी होगी.
पहला ये कि सुरक्षा परिषद सुधार को ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ना होगा. भारत यदि अफ्रीकी देशों के स्थायी प्रतिनिधित्व की मांग का समर्थन करता है तो उसकी अपनी दावेदारी भी अधिक व्यापक वैश्विक सुधार का हिस्सा बन सकती है. यह भारत के लिए केवल राष्ट्रीय हित का प्रश्न नहीं, बल्कि संस्थागत बदलाव का प्रश्न बनेगा.

दूसरा कि भारत को नई वैश्विक तकनीकी व्यवस्था में नियम बनाने की भूमिका बढ़ानी होगी. एआई पर दुनिया अभी नियमों की शुरुआत में है और भारत के पास बड़ी डिजिटल आबादी, मजबूत तकनीकी क्षमता और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का अनुभव है. उसे विकासशील देशों के लिए ऐसी AI व्यवस्था की वकालत करनी चाहिए जिसमें तकनीक तक पहुंच, डेटा, सुरक्षा और लाभ का बंटवारा कुछ गिने-चुने देशों और कंपनियों तक सीमित न रहे.

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तीसरा, भारत को ग्लोबल साउथ की आवाज को केवल भाषणों तक नहीं रखना होगा. कर्ज, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और तकनीक जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों के लिए व्यावहारिक प्रस्ताव तैयार करने होंगे. अगर भारत इन मुद्दों पर साझा समाधान देने की क्षमता दिखाता है तो उसकी कूटनीतिक भूमिका केवल “एक और बड़ी शक्ति” की नहीं रहेगी, बल्कि वह अलग-अलग शक्ति-केंद्रों के बीच बातचीत कराने वाली ताकत बन सकता है.

भारत अगर केवल यह कहे कि दुनिया बदल गई है और हमें स्थायी सीट मिलनी चाहिए, तो यह एक सीमित मांग होगी लेकिन अगर भारत यह कहे कि दुनिया बदल गई है, इसलिए सुरक्षा, तकनीक, वित्त, जलवायु और विकास के नियम भी बदलने चाहिए, तो यह एक व्यापक दृष्टि होगी और यही अंतर भारत को दूसरे शक्ति-केंद्रों से अलग कर सकता है.

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आज संयुक्त राष्ट्र के सामने एक और महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या सुधार केवल प्रशासनिक होगा या राजनीतिक भी? UN80 जैसी प्रक्रिया के तहत संयुक्त राष्ट्र अपने कामकाज और संस्थागत व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन हाल की महासभा में यह साफ कहा गया कि केवल विभागों को बदलना या खर्च कम करना पर्याप्त नहीं है बल्कि असली जरूरत राजनीतिक सुधार की है.

एक कमजोर संयुक्त राष्ट्र की जगह केवल नए-नए समूहों का बनना समाधान नहीं है. अगर दुनिया अलग-अलग गुटों में बंटती गई और हर संकट में अलग-अलग नियम लागू होने लगे तो छोटे और कमजोर देशों की स्थिति और कठिन हो सकती है. आज किसी छोटे देश के पास संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनी बात रखने का अधिकार है. वह बड़े देशों से अलग अपनी स्थिति दर्ज करा सकता है. उसके पास अंतरराष्ट्रीय कानून और साझा संस्थाओं का सहारा है. यह व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं है, लेकिन इसके कमजोर पड़ने के बाद क्या आएगा, इसका जवाब अभी दुनिया के पास नहीं है इसलिए संयुक्त राष्ट्र को खत्म होने वाली संस्था की तरह देखना भी गलत होगा और उसे बिना बदलाव के चलने देना भी. उसे आज की दुनिया के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व वाला, अधिक जवाबदेह और अधिक प्रभावी बनाना होगा और भारत को इस बदलाव का दर्शक नहीं, भागीदार बनना होगा क्योंकि आने वाली दुनिया में सवाल केवल यह नहीं होगा कि अमेरिका कितना शक्तिशाली है, चीन कितना आगे बढ़ता है या भारत कितनी तेजी से बढ़ता है. असली सवाल यह होगा कि इन शक्तियों के बीच संबंध किस नियम से चलेंगे. अगर नियम कमजोर होंगे तो ताकतवर देशों की आवाज सबसे ज्यादा सुनी जाएगी. अगर संस्थाएं मजबूत होंगी तो छोटे देशों के पास भी अपनी बात रखने की जगह रहेगी इसीलिए संयुक्त राष्ट्र का भविष्य केवल संयुक्त राष्ट्र का भविष्य नहीं है. यह उस विचार का भविष्य है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ताकत के साथ नियम भी जरूरी हैं. आज दुनिया एक नए मोड़ पर है. पुरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है, नई व्यवस्था अभी पूरी तरह बनी नहीं है. यही संक्रमण सबसे ज्यादा जोखिम वाला समय होता है.

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भारत के लिए यही समय अवसर भी है कि वह अपनी बढ़ती आर्थिक शक्ति, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता, ग्लोबल साउथ से संबंध और ब्रिक्स जैसी व्यवस्थाओं में अपनी भूमिका का इस्तेमाल करके एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की वकालत कर सकता है जिसमें अधिक प्रतिनिधित्व हो, लेकिन साथ ही अधिक जिम्मेदारी भी हो क्योंकि आखिर दुनिया को केवल नए शक्तिशाली देशों की जरूरत नहीं है बल्कि उसे ऐसे देशों की जरूरत है जो शक्ति बढ़ने के साथ नियमों को भी मजबूत करें इसलिए आज सवाल यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र कमजोर हो रहा है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि अगर संयुक्त राष्ट्र कमजोर हुआ तो दुनिया किसके हाथ में जाएगी? कुछ बड़ी शक्तियों के, बड़े बाजारों के, बड़ी तकनीकी कंपनियों के या उन साझा संस्थाओं के हाथ में जिन्हें दुनिया मिलकर मजबूत करेगी? इस सवाल का जवाब आने वाले वर्षों की वैश्विक राजनीति तय करेगा और उस जवाब में भारत की भूमिका केवल एक स्थायी सीट पाने वाले देश की नहीं, बल्कि नई वैश्विक व्यवस्था के नियम गढ़ने वाले देश की होनी चाहिए.

डिस्क्लेमर – लेखक ललित सिहाग जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं, वह रिसर्चर हैं और वर्तमान में नीति एवं राजनीति पर लिखते हैं. लेख में साझा किए गए तथ्य लेखक के निजी विचार हैं.

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