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अजित पवार नहीं रहे: सत्ता, संघर्ष और सियासत के अधूरे सपनों का अंत

महाराष्ट्र की राजनीति में 28 जनवरी का दिन दुखद साबित हुआ है। बारामती में प्लेन क्रैश में डिप्टी सीएम और लोकप्रिय नेता अजित पवार का निधन हो गया है। हादसे ने राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह हादसा सभी के सदमे से कम नहीं है। न्यूज 24 के एंकर मानक गुप्ता ने इस बारे में अपनी राय रखी है।

सिर्फ सड़सठ साल के थे अजित पवार. अभी तो उन्होंने अपनी राजनीति की आखिरी और निर्णायक पारी मुझे लगा, शुरू की थी. अभी हाल ही में जब उनका इंटरव्यू करके आया, महाराष्ट्र के लोकल बॉडी इलेक्शन से, के दौरान तब ढेर सारी बातें उनसे हुई. बहुत डिटेल में मैंने उनसे इंटरव्यू किया था. उस इंटरव्यू में बहुत सारी बातें वो कह गए, बहुत सारी बातें उन्होंने नहीं कही. वजह बिल्कुल साफ थी. जैसा मैंने कहा, उनकी आखिरी और निर्णायक पारी अभी आना बाकी थी.

आज सुबह जब सोशल मीडिया पर और इधर उधर से खबर आई कि अजित पवार का विमान बारामती में क्रैश हो गया. बिल्कुल पहले तो यकीन नहीं हुआ, लेकिन फिर उसके बाद जैसे-जैसे खबर कन्फर्म होने लगी तो मन में एक ही ख्याल था कि हे भगवान! बस किसी को कुछ हुआ ना हो. इस तरह के प्लेन क्रैश जब होते हैं, तब सर्वाइवर्स बहुत कम आमतौर पर मिलते हैं. तो सोचा शायद इमरजेंसी लैंडिंग होगी, बच गए होंगे. पहला ख्याल यही आता है लेकिन उसके बाद जब वीडियो आने लगे, जिसमें विमान जल रहा है. तब फिर मन में लगा कि शायद अजित पवार के साथ भी बिल्कुल वही हुआ होगा जो अब से पहले भी कुछ नेताओं के साथ हो चुका है.

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पिछले डेढ़ साल में अजित पवार के साथ मैंने दो तीन बार डिटेल में इंटरव्यू किया. लोकसभा इलेक्शन के टाइम भी किया था और फिर अभी हाल में किया. पिछली बार वाला जो इंटरव्यू था, अभी महाराष्ट्र चुनाव के दौरान, उसमें ऐसा लगा कि अजित पवार एक नई पारी खेलने के लिए पूरी तरह से तैयार थे. असेंबली इलेक्शन में अपनी पार्टी को पूरी तरह एस्टेब्लिश कर चुके थे.

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शरद पवार, सुप्रिया सुले, अपने चाचा से, अपनी कजिन बहन से अलग होने के बाद विरासत की लड़ाई में वो जीत चुके थे. ये बता चुके थे कि असली NCP मैं ही हूं, मेरे पास ही है पार्टी. इसीलिए इस बार जब उनसे मिला तो लगा जैसे उनके मन में एक राहत भी थी, लेकिन उसके बावजूद एक बेचैनी भी थी. और वो बेचैनी इस बात की थी कि सबको पता है उनके मन में प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा दशकों से थी और वो अपनी इच्छा छिपाते नहीं थे.

इस बार भी मैंने इंटरव्यू में उनसे पूछा कि दादा सीएम के बनने के बारे में अब नहीं सोचते क्या? उन्होंने कहा कि बिल्कुल सोचता हूं, लेकिन मेरे पास नंबर नहीं है. फिर मैंने उनसे पूछा सीएम बनने के बारे में और डिटेल में. तो उन्होंने कहा कि जैसे शिंदे जी को बीजेपी ने कम सीटें होने के बावजूद सीएम बना दिया, अगर मुझसे कहते कि आपको सीएम बना देंगे, बीजेपी वाले कहते तो हम ही पूरी पार्टी ले आते. जब उन्नीस में दो तीन दिन के लिए डिप्टी सीएम बने थे अजित पवार, ये शायद तब का जिक्र कर रहे थे वो. मैंने कहा कि दादा आप तो बिल्कुल मौसम वैज्ञानिक हो गए हैं.

जैसे पहले कभी किसी समय रामविलास पासवान को फिर चिराग पासवान को उस श्रेणी में रखा जाता था. आपने भी दो हज़ार उन्नीस में पहले ही देख लिया था कि महाराष्ट्र की राजनीति में क्या होने वाला है और आप NDA में चले गए थे. तो मुस्कुराने लगे, ज्यादा इस पर बोले नहीं. पर ऐसा लगता है कि अभी हाल में जो पुणे में उन्होंने NCP, शरद पवार यानी अपने चाचा, अपनी बहन के साथ जो पैचअप किया, मिलकर लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ा. उससे लग रहा था कि NCP को एकजुट करने की सारी तैयारी हो गई थी. महाराष्ट्र की देश की राजनीति में एक नया कदम उठाने की तैयारी हो गई थी.

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मैंने उनसे बहुत सवाल पूछे. मैंने कहा कि दादा, क्या NCP एक होने वाली है, क्या? क्या सुप्रिया सुले केंद्र में मंत्री बन जाएंगी और आप महाराष्ट्र संभालेंगे? तो अपने पत्ते उन्होंने छिपा के रखे. बोले कि हां, ये अभी जो ये जो पैचअप हुआ है, जो अलायंस हुआ है, वो सिर्फ लोकल बॉडी इलेक्शन के लिए है. बाकी आगे के बारे में कह नहीं सकता मैं. पर एक, एक बेचैनी उनके मन में, उनकी बातों में, उनकी बॉडी लैंग्वेज में देख सकता था मैं. चुनाव का समय है. जब मैं उनके साथ इंटरव्यू कर रहा था तो लगा कि प्रचार करने जाना होगा तो यह बेचैनी तो होगी ही. समय कम रहता है, सुबह से रात तक प्रचार करना होता है और इस बार का तो लोकल बॉडी इलेक्शन प्रतिष्ठा का सवाल था, क्योंकि बीजेपी से अलग होकर लड़ रहे थे पुणे में.

उनको यह दिखाना था कि मैं NCP को एकजुट करके एक अलग ताकत के रूप में स्थापित कर सकता हूं. तो काम बहुत था उनके पास करने के लिए. जैसा मैंने कहा, सड़सठ साल के थे, लेकिन बहुत एनर्जेटिक थे. इंटरव्यू के लिए जब मैंने उनसे उनकी टीम से बात की तो उन्होंने कहा, "एक बार फिर से सुबह पांच बजे से और आठ बजे के बीच ही करेंगे." आई वॉज नॉट सरप्राइज. मुझे पता था वो सुबह-सुबह चार साढ़े चार बजे उठ जाते हैं और उसके बाद सारे इंटरव्यू, लोगों से मिलना-जुलना, सुबह पांच से आठ नौ बजे के बीच ही करते हैं.

पिछला इंटरव्यू भी जब मैंने किया था, वो मुंबई में हुआ था. तब भी सुबह-सुबह उन्होंने बुलाया था इंटरव्यू करने के लिए. जल्दी उठते हैं, लोगों से मिलने जुलने का, मीडिया से बात करने का काम सुबह निपटाते हैं और उसके बाद निकल जाते हैं फिर. मंत्रालय का काम करना हो, अपने क्षेत्रों में जाना हो, फिर घूमने फिरने का काम करते थे. अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि अजित पवार नहीं रहे, स्वस्थ थे. ऐसा नहीं था कि उनके अंदर भूख खत्म हो गई थी. बहुत कुछ करना उनके लिए बाकी था. अजित पवार के बारे में बहुत सारे विवाद भी आपने अक्सर सुने, पढ़े, देखे होंगे…. अजीत पवार, शरद पवार की तरह सुप्रिया सुले की तरह उस तरह के नेता नहीं थे, जो बोलने में बहुत माहिर हों. इसीलिए जब भी वो कोई बयान देते थे, दिल से कुछ भी कह देते थे और उस पर खूब विवाद भी हो जाते थे.

पर एक बात सच है, उनके विरोधी भी यह मानते हैं कि उनके जैसा एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल किसी के पास नहीं था और हार्ड टास्क मास्टर थे. और यह भी कहा जाता है कि अजीत पवार अगर नाराज होते थे तो सबको पांच मिनट में पता चल जाता था. कहने का मतलब छिपाते नहीं थे नाराजगी. अफसरों पर बहुत टाइट कंट्रोल रखते थे और अजीत दादा! अब जब अपने करियर की आखिरी पारी खेलने वाले थे तो उन्होंने प्लान तो लंबा चौड़ा बनाया था. अपने दोनों बेटों को राजनीति में एक्टिव कर दिया था, पिछले साल डेढ़ साल से. हालांकि उनकी पत्नी लोकसभा इलेक्शन हार गई थी. उनको राज्यसभा भेजा सुनित्रा पवार को. लेकिन जो बेटे हैं, जय और पार्थ, उन दोनों को पुणे और बारामती का जिम्मा धीरे धीरे सौंप रहे थे वो. तो तैयारी तो कर रहे थे, लेकिन अब जाहिर है होनी को कौन टाल सकता है? लेकिन अब उनके जाने के बाद मेरे मन में कुछ और भी सवाल अचानक पैदा होने लगे. पत्रकार हूं, अपने पत्रकार के मन को, दिमाग को शांत करना ऐसे में भी बड़ा मुश्किल है.

अब सोच रहा हूं कि आगे क्या होगा? अब अजीत पवार चले गए तो NCP, अजीत पवार या NCP जिसे कहते हैं, क्योंकि नाम तो उनको मिल गया था, उसको कौन संभालेगा? और यह जो NCP शरद पवार गुट के साथ NCP का अलायंस हुआ, दोनों के एकजुट होने की खबरें आ रही थी, इसका क्या होगा? शरद पवार तो आपको पता ही है, पचासी, छियासी साल के हैं. वो रिटायर होने के बहुत करीब पहुंच गए हैं. क्या अब दोनों पार्टियों का मर्जर होगा? क्योंकि मुझे नहीं लगता अजीत पवार के जाने के बाद सुनित्रा पवार या उनके बेटे अभी इस स्थिति में हैं कि वो पार्टी को संभाल सकें. अब सारी जिम्मेदारी सुप्रिया सुले के कंधों पर आ जाएगी. अब पार्टी अगर एक होती है तो क्या एनडीए में रहेगी? शरद पवार, सुप्रिया सुले इस बात के लिए तैयार होंगे. अगर होते हैं तो डिप्टी सीएम महाराष्ट्र में कौन बनेगा? क्या सुनित्रा पवार बनेंगी? क्या सुप्रिया सुले बनेंगी? बहुत सारे सवाल हैं. अब देखते हैं आगे क्या होगा. लेकिन अजीत दादा के बारे में इतना जरूर मैं कह सकता हूं कि अजीत दादा को महाराष्ट्र की राजनीति में नहीं, देश की राजनीति में लोग विवादों के लिए तो याद रखेंगे ही.

सबसे बड़ा विवाद तो याद करिए. देवेंद्र फडणवीस बोलते थे, चक्की पीसींग, पीसींग. प्रधानमंत्री बोले सत्तर हज़ार करोड़ का घोटाला करने वाले. लेकिन अजीत पवार ने भी मौका नहीं छोड़ा. अभी हाल में साफ साफ कह दिया था. बोले, जिन लोगों ने मुझ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, आज वही मेरे साथ बताइए, सत्ता में बैठे हुए हैं. मैंने उनसे पूछा भी, इस बारे में कि यह बयान आपने क्यों दिया? बोले, अब जाने दीजिए. जाहिर है, बीजेपी के साथ मिलकर रहना है, NDA में सरकार चलानी है तो वो रिश्ते और खराब नहीं करना चाहते थे. यह बयानबाजी भी लोकल बॉडी इलेक्शंस की वजह से हुई, क्योंकि वहां बीजेपी और NCP का आमने सामने का मुकाबला था. दोनों तरफ से बयानबाजी हो रही थी. तो विवादों के लिए, बेबाक बोल के लिए, कॉन्ट्रोवर्शियल स्टेटमेंट्स के लिए तो अजीत पवार को याद किया ही जाएगा. लेकिन लोग यह भी याद रखेंगे कि सबसे ज्यादा छह बार महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम रहे.

छह बार, NCP से अलग हुए, फिर साबित कर दिया कि शरद पवार के बिना भी वो NCP के सबसे बड़े नेता हैं. उसके अलावा लोग-- कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें इरिगेशन घोटाले के लिए याद किया जाएगा, लेकिन उनके समर्थक कहते हैं कि उनको वॉटर मैन के तौर पर हम लोग याद रखेंगे. इरिगेशन घोटाला वोटाला कुछ नहीं है, उन्हें जगह जगह जैसे पानी पहुंचाया, उसके लिए हम याद रखेंगे. कुछ लोग कहते हैं फास्ट डिसीजन मेकिंग के लिए याद रखेंगे. फैसले लेते थे खटा खट, देरी बिल्कुल नहीं करते थे, लटकाते नहीं थे, बिल्कुल भी. उनके अफसरों में, उनके नेताओं में, कार्यकर्ताओं में, MLA, MPS में उनका एक खौफ भी था, डर था उनका. अब जाहिर है कि जो लोग उनसे डरते थे, आज उनको मिस भी करेंगे, क्योंकि उनकी पार्टी के सारे नेता जानते हैं, अजीत दादा के बिना उनका क्या होगा.

कुछ लोग उनको उनके फाइनेंशियल माइंड के लिए याद रखेंगे, क्योंकि वो आंकड़ों में, फाइनेंशियल मैटर्स में, फाइल्स में, नंबर्स में, प्लानिंग में, इसमें बहुत अनुभवी थे, बहुत मंझे हुए थे. इतने सारे बजट वो पेश कर चुके थे. तो अब जाहिर है सब लोग उन्हें अपने अपने हिसाब से याद रखेंगे. लेकिन मैं अजीत पवार को याद रखूंगा, उनके सहज बर्ताव के लिए. खरी खरी कहते थे, पत्रकारों से बहुत अच्छे रिश्ते रखते थे और हाल में जिस तरह समय के हिसाब से खुद को ढाल रहे थे, पार्टी को ढाल रहे थे, वह भी किसी से छुपा नहीं है. जैसा मैंने कहा ना, अगली पीढ़ी को अपने परिवार में पार्टी सौंपने की तैयारी थी.

कुछ लोग कहेंगे परिवारवाद है लेकिन मैं बस यह कह रहा हूं कि कैसे वो समय के साथ बदलने को भी तैयार थे. लोकसभा, असेंबली का इलेक्शन हो, उसके लिए इलेक्शन स्ट्रैटेजिस्ट को हायर करना, नई पीढ़ी के हाथों में कमान सौंपना, डिजिटली सोशल मीडिया पर अपनी पकड़ को मजबूत करना, धीरे धीरे जीरो से शुरू करना. उससे पहले मुझे नहीं याद पड़ता. चार पांच साल पहले उनकी पार्टी की तरफ से या अजीत पवार की तरफ से सोशल मीडिया पर और डिजिटल मीडिया में इतना ध्यान दिया जाता होगा, लेकिन वो बदले समय के साथ. सो अजीत दादा, रेस्ट इन पीस और आपके परिवार के साथ मेरी संवेदनाएं. ऊपर वाला उनको शक्ति दे, इस क्षति से निपटने के लिए, इसे सहने के लिए.

(लेखक न्यूज24 के एंकर और कंसल्टिंग एडिटर हैं।)


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