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दादी-नानी के जमाने में घरों में क्यों होते थे 2 पल्ले वाले दरवाजे? दिलचस्प है इसके पीछे की वजह

Double Leaf Doors: भले ही आजकल के घरों और फ्लैट्स में अक्सर सिंगल-पैनल वाले दरवाजे इस्तेमाल होते हैं, लेकिन अगर आप भारत की कई पुरानी और ऐतिहासिक इमारतों को देखेंगे तो वहां डबल-लीफ डोर देखने को मिल जाएंगे.

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2 पल्लों के दरवाजे क्यों?

  • घर और खेती-बाड़ी के बड़े सामान को आसानी से लाने-ले जाने की सुविधा.
  • गर्मी के मौसम में बेहतर वेंटिलेशन की वजह से ऐसे दरवाजे बनाए जाते थे.
  • मजबूत लकड़ी के ढांचे की वजह से घर बेहतर हिफाजत होती थी.
  • खुशहाली, मेहमाननवाजी और सामाजिक रुतबे का प्रतीक थे 2 पल्ले वाले दरवाजे.
  • त्योहारों और पारिवारिक समारोहों में इन दरवाजों की अहमित बढ़ जाती थी.
  • पारंपरिक भारतीय वास्तुकला की सुंदरता को और बढ़ावा देने के लिए ऐसा किया जाता था.

Why Were Double Leaf Doors Installed in Traditional Houses: मॉडर्न आर्किटेक्चर के कॉमन होने से पहले, भारत के कई पारंपरिक घरों के दरवाजों पर बड़े दो-पल्ले होते थे. ये दरवाजे, जो बीच से खुलने वाले 2 हिस्सों से बने होते थे. ऐसा सिर्फ सजावट के लिए नहीं थे, बल्कि इनके कई प्रैक्टिकल और कल्चरल फायदे भी थे. लेकिन आज के दौर में ज्यादातर सिंगल लीफ डोर देखने को मिलते थे. आखिर हमारी दादी-नानी के जमाने में दरवाजे का डिजाइन अलग क्यों था? आइए समझने की कोशिश करते हैं.

1. चौड़े दरवाजों की जरूरत

2 पल्लों वाले दरवाजे लगाने की एक बड़ी वजह सुविधा थी. गांवों और पुराने कस्बों में, परिवार अक्सर फर्नीचर, खेती के औजार, अनाज की बोरियां और गाड़ियां जैसी बड़ी चीजें घर के अंदर-बाहर ले जाते थे. चौड़ा दरवाजा होने से ये काम बहुत आसान हो जाते थे.

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2. फुल वेंटिलेशन

2 पल्लों वाले दरवाजे वेंटिलेशन को बेहतर बनाने में भी मदद करते थे. भारत के गर्म मौसम में हवा का प्राकृतिक बहाव जरूरी था, और दोनों पल्लों को खोलने से ताजी हवा पूरे घर में घूमती थी. इससे गर्मियों के महीनों में घर के अंदर की जगह ठंडी रहती थी.

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3. सिक्योरिटी

घर की सुरक्षा भी एक अहम पहलू था. पारंपरिक 2 पल्लों वाले दरवाजे आम तौर पर मजबूत लकड़ी से बनाए जाते थे और उन पर लोहे की फिटिंग लगी होती थी. ये चोरी से मजबूत सुरक्षा देते थे और खराब मौसम का भी सामना कर सकते थे.

4. सांस्कृतिक और धार्मिक अहमियत

भारत के कई इलाकों में 2 पल्लों वाले दरवाजों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी था. बड़े दरवाजों को समृद्धि और मेहमाननवाजी का प्रतीक माना जाता था. शादियों, त्योहारों और धार्मिक समारोहों के दौरान, मेहमानों का स्वागत करने और खास मौकों को मनाने के लिए दरवाजे के दोनों पल्लों को पूरी तरह खोल दिया जाता था.

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5. शान ओ शौकत

आर्किटेक्चर के नजरिए से, ये दरवाजे घरों और हवेलियों की शान बढ़ाते थे. हुनरमंद कारीगर अक्सर इन पर बारीक नक्काशी, पीतल की कीलें और ट्रेडिशनल डिजाइन बनाते थे, जो परिवार के रुतबे और फोक आर्टिस्टिक ट्रेडिशन को बयां करते थे.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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