सेवा और समर्पण की मिसाल थीं भगिनी निवेदिता, प्लेग पीड़ितों की जान बचाने के लिए झोंक दी थी पूरी जिंदगी

1899 में कोलकाता में प्लेग फैलने पर भगिनी निवेदिता ने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की सेवा की. जानिए उनके त्याग, महिला शिक्षा और भारत के लिए किए गए योगदान की कहानी.

Untitled design (30)

भगिनी निवेदिता ने 1899 में कोलकाता में प्लेग महामारी के दौरान मरीजों की जान बचाने और उनकी देखभाल के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था.

त्याग, सेवा, साहस और मानवीय संवेदना की अद्भुत मिसाल रहीं भगिनी निवेदिता को श्रद्धा व सम्मान पूर्वक याद किया जाता है. भारत को अपनी कर्मभूमि बनाने वाली इस महान समाजसेविका ने न केवल महिला शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान दिया, बल्कि देश की आजादी के आंदोलन और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 1899 में जब तत्कालीन कलकत्ता में प्लेग की महामारी ने भयावह रूप ले लिया था, तब उन्होंने अपनी जान और स्वास्थ्य की परवाह किए बिना संक्रमित मरीजों और गरीबों की सेवा में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था.

विज्ञापन

प्लेग महामारी के दौरान जहां संक्रमण के डर से लोग बीमारों से दूरी बना रहे थे, वहीं भगिनी निवेदिता गंदी बस्तियों और संकरी गलियों में पहुंचकर लोगों की मदद कर रही थीं. उन्होंने स्वयं सफाई अभियान में हिस्सा लिया, जरूरतमंदों की सहायता की और युवाओं को महामारी पीड़ितों की सेवा के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया. उनका मानना था कि मानवता की सच्ची सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है.

विज्ञापन

डॉ. आरजी कर ने भी की थी निस्वार्थ सेवा की प्रशंसा

उस दौर के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. आरजी कर ने भी प्लेग पीड़ितों के प्रति भगिनी निवेदिता के अदम्य साहस और निस्वार्थ सेवा भावना की प्रशंसा की थी. उन्होंने अपने एक संस्मरण में बागबाजार की एक झुग्गी बस्ती में प्लेग से संक्रमित बच्चे की देखभाल से जुड़ी बेहद मार्मिक घटना का उल्लेख किया था. डॉ. आरजी कर के अनुसार, एक सुबह वह बागबाजार की एक गरीब बस्ती में प्लेग पीड़ित बच्चे को देखने पहुंचे थे. वहां भगिनी निवेदिता भी मौजूद थीं. बच्चे की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने उसकी देखभाल की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की इच्छा जताई. चिकित्सक ने उन्हें संक्रमण के खतरे और आवश्यक सावधानियों के बारे में बताया.

लेकिन जब डॉ. कर दोबारा दोपहर में वहां पहुंचे, तो उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा, जिसे वह जीवनभर नहीं भूल सके. एक नम और जर्जर झोपड़ी में भगिनी निवेदिता उस बीमार बच्चे को अपनी गोद में लेकर बैठी थीं. इसके बाद वह लगातार कई दिनों तक उसी झोपड़ी में रहकर बच्चे की सेवा करती रहीं. यहां तक कि उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और मरीज की देखभाल को ही अपना सबसे बड़ा दायित्व बना लिया.

विज्ञापन

झोपड़ी को संक्रमणमुक्त करने के लिए जब दीवारों पर सफेदी करने की आवश्यकता पड़ी, तब उन्होंने स्वयं छोटी सी सीढ़ी उठाई और सफेदी करने में जुट गईं. बच्चे की हालत लगातार बिगड़ रही थी और उसके बचने की उम्मीद बेहद कम थी. इसके बावजूद निवेदिता की सेवा और ममता में कोई कमी नहीं आई. आखिरकार दो दिनों बाद वह बच्चा उनकी स्नेहभरी गोद में ही अंतिम सांस ले गया. यह घटना भगिनी निवेदिता के त्याग, साहस और मानवीय संवेदना का ऐसा उदाहरण बनी, जिसे आज भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है.

आयरलैंड में हुआ जन्म, स्वामी विवेकानंद से मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

भगिनी निवेदिता का मूल नाम मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल था. उनका जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में हुआ था. प्रारंभिक जीवन से ही उनकी रुचि शिक्षा, साहित्य, कला और समाज सेवा में थी. उन्होंने शिक्षिका के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और बाद में विम्बलडन में रस्किन स्कूल की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग किए. वर्ष 1895 में लंदन में उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई. स्वामी विवेकानंद के विचारों, व्यक्तित्व और भारतीय दर्शन से वह इतनी प्रभावित हुईं कि उनके जीवन की दिशा ही बदल गई. उन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया और भारत को अपनी कर्मभूमि बनाने का निर्णय लिया. 28 जनवरी 1898 को मार्गरेट नोबल भारत पहुंचीं. इसके बाद 25 मार्च 1898 को स्वामी विवेकानंद ने उन्हें विधिवत ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी और नया नाम ‘निवेदिता’ प्रदान किया. इस नाम का अर्थ है- पूर्ण रूप से समर्पित. आगे चलकर उन्होंने वास्तव में अपना पूरा जीवन भारत और भारतीय समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया.

विज्ञापन

महिला शिक्षा के लिए खोला बालिका विद्यालय

भारत आने के बाद भगिनी निवेदिता ने महिला शिक्षा को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया. उस समय समाज के बड़े हिस्से में लड़कियों की शिक्षा को लेकर कई तरह की सामाजिक बाधाएं मौजूद थीं. ऐसे माहौल में उन्होंने कोलकाता में बालिकाओं के लिए विद्यालय की स्थापना की. इस विद्यालय का उद्घाटन मां शारदा ने किया था. मां शारदा ने निवेदिता को अपनी पुत्री की तरह स्नेह दिया और उनके शैक्षणिक प्रयासों को प्रोत्साहित किया. निवेदिता का मानना था कि किसी भी समाज की वास्तविक उन्नति महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बिना संभव नहीं है. उन्होंने केवल किताबी शिक्षा तक अपनी सोच सीमित नहीं रखी, बल्कि बालिकाओं में आत्मविश्वास, भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना विकसित करने पर भी जोर दिया.

स्वतंत्रता सेनानियों और भारतीय वैज्ञानिकों का भी किया समर्थन

भगिनी निवेदिता का योगदान केवल शिक्षा और समाज सेवा तक सीमित नहीं था. वह भारत की राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की भी प्रबल समर्थक थीं. उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों और देशभक्तों को वैचारिक तथा अन्य आवश्यक सहयोग दिया. 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान भी उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद का समर्थन किया. वह चाहती थीं कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान, गौरव और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़े. उनका संपर्क उस समय के कई महान व्यक्तित्वों से रहा. इनमें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस, अवनींद्रनाथ ठाकुर और नंदलाल बोस जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल थे. उन्होंने भारतीय कला, विज्ञान और इतिहास को प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस के शोध कार्यों को आगे बढ़ाने और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयासों में भी निवेदिता ने सहयोग किया. भारतीय इतिहास और संस्कृति को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की उनकी सोच भी उल्लेखनीय थी.

विज्ञापन

44 वर्ष की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

भारत को अपना घर और भारतीयों को अपना परिवार मानने वाली भगिनी निवेदिता का निधन 13 अक्टूबर 1911 को दार्जिलिंग में हुआ. उस समय उनकी उम्र महज 44 वर्ष थी. उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया.
दार्जिलिंग में उनके समाधि स्थल पर अंकित संदेश आज भी उनके जीवन दर्शन की याद दिलाता है- ‘यहां भगिनी निवेदिता विश्राम कर रही हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत को समर्पित कर दिया.’

कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाले हुगली नदी पर बने निवेदिता सेतु का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है.
भगिनी निवेदिता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि देशप्रेम केवल जन्मभूमि से नहीं, बल्कि विचारों, कर्मों और समर्पण से भी जुड़ा होता है. आयरलैंड में जन्म लेने वाली इस महिला ने भारत को अपना सब कुछ मान लिया. प्लेग महामारी के दौरान एक असहाय बच्चे की गोद में बैठकर सेवा करने से लेकर महिला शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना के लिए संघर्ष तक, उनका पूरा जीवन मानवता के प्रति समर्पण की कहानी है. यही वजह है कि उन्हें आज भी ‘दया की प्रतिमूर्ति’ और भारत की सच्ची सेविका के रूप में याद किया जाता है.

विज्ञापन

न्यूज 24 पर पढ़ें देश,राष्ट्रीय समाचार (National News),खेल,मनोरंजन,धर्म,लाइफ़स्टाइल,हेल्थ,शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।

First published on:

और पढ़ें: हमारे संपादकीय दिशानिर्देश और मानक यहाँ देखें।

लेख समाप्त

लेखक के बारे में

विज्ञापन
होम पेज पर वापस जाएँ