सऊदी अरब की प्रमुख तेल कंपनी सऊदी अरामको एक बार फिर चर्चा में है. कंपनी से जुड़े हालिया हमले ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में उसकी अहमियत पर ध्यान खींचा है. अरामको केवल तेल निकालने वाली कंपनी नहीं, बल्कि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और दुनिया में तेल की आपूर्ति का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. हालांकि, किसी इमारत पर हमले का मतलब यह नहीं है कि तेल उत्पादन या आपूर्ति भी प्रभावित हुई है. इसके लिए नुकसान की आधिकारिक जानकारी जरूरी है. आज दुनिया की बड़ी ऊर्जा कंपनियों में शामिल अरामको की शुरुआत 1933 में सऊदी अरब में तेल की खोज के लिए हुए एक समझौते से हुई थी. आइए जानते हैं कि कैसे यह कंपनी एक तेल खोज परियोजना से वैश्विक ऊर्जा ताकत बनी.
भारत और सऊदी अरब के बीच कितना बड़ा है तेल कारोबार?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है. भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने सऊदी अरब से करीब 3.59 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया. यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 13.81 प्रतिशत था. दोनों के बीच एक बड़ी रिफाइनरी परियोजना को लेकर समझौता हुआ था. 11 अप्रैल 2018 को सऊदी अरामको और भारतीय तेल कंपनियों के समूह ने महाराष्ट्र के रत्नागिरी में रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स विकसित करने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे.
इस परियोजना में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) शामिल थीं. प्रस्तावित रिफाइनरी की क्षमता प्रतिदिन 12 लाख बैरल कच्चा तेल संसाधित करने की थी और शुरुआती अनुमान के मुताबिक इसकी लागत करीब 44 अरब डॉलर थी. हालांकि, MoU पर हस्ताक्षर होने का मतलब यह नहीं कि परियोजना पूरी हो गई. रत्नागिरी रिफाइनरी की योजना को जमीन और अन्य व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इसलिए इसे चालू रिफाइनरी या पूरी हो चुकी निवेश डील बताना सही नहीं होगा. अगर सऊदी अरब में किसी बड़ी तेल सुविधा, पाइपलाइन या निर्यात टर्मिनल का काम बाधित होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे भारत का आयात बिल बढ़ने और ईंधन की कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है.
1933 में हुई कंपनी की शुरुआत
29 मई 1933 को सऊदी अरब और अमेरिका की स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी ऑफ कैलिफोर्निया (SOCAL) के बीच तेल की खोज और उत्पादन का समझौता हुआ. इसे लागू करने के लिए कैलिफोर्निया अरेबियन स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी (CASOC) बनाई गई. कंपनी ने सऊदी अरब के रेगिस्तानी इलाकों में तेल की तलाश शुरू की. शुरुआती कोशिशों के बाद 1938 में दम्माम वेल नंबर 7 से व्यावसायिक मात्रा में तेल मिला. इस कुएं को ‘Well of Prosperity’ यानी समृद्धि का कुआं कहा गया. 1939 में सऊदी अरब से कच्चे तेल की सप्लाई शुरू हो गई.
1940 से 1960 के दशक में बढ़ा उत्पादन
1944 में कंपनी का नाम बदलकर अरेबियन अमेरिकन ऑयल कंपनी कर दिया गया. इसी से आगे चलकर ‘अरामको’ नाम लोकप्रिय हुआ. 1948 में दो अन्य अमेरिकी तेल कंपनियों ने भी इसमें हिस्सेदारी खरीदी. 1949 में कंपनी का तेल उत्पादन प्रतिदिन पांच लाख बैरल तक पहुंच गया. 1950 में तेल को दूसरे बाजारों तक पहुंचाने के लिए ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन पूरी हुई. 1951 में कंपनी ने समुद्र के नीचे सफानिया तेल क्षेत्र की खोज की, जो दुनिया के बड़े समुद्र के अंदर वाले तेल क्षेत्रों में शामिल. 1958 तक उत्पादन प्रतिदिन 10 लाख बैरल से अधिक हो गया. इससे सऊदी अरब की वैश्विक तेल बाजार में भूमिका मजबूत होने लगी.
1970 के दशक में बढ़ा सऊदी सरकार का नियंत्रण
1973 में सऊदी सरकार ने अरामको में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी. 1974 में इसे बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया. 1980 में सरकार ने कंपनी की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली. 1988 में सऊदी अरेबियन ऑयल कंपनी की आधिकारिक स्थापना हुई. इससे सऊदी अरब का अपने तेल संसाधनों और उनसे जुड़े कारोबार पर नियंत्रण मजबूत हुआ.
1990 के दशक में विदेशों तक पहुंचा कारोबार
अरामको ने 1990 के दशक में दूसरे देशों में निवेश बढ़ाया. 1991 में कंपनी ने दक्षिण कोरिया की स्सांगयोंग ऑयल रिफाइनिंग कंपनी (SsangYong Oil Refining Company) में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी. इस कंपनी का नाम 2000 में बदलकर एस-ऑयल (S-OIL Corporation) कर दिया गया. 1994 में अरामको ने फिलीपींस की पेट्रॉन कॉरपोरेशन में भी हिस्सेदारी हासिल की. इन निवेशों से कंपनी का कारोबार तेल उत्पादन से आगे बढ़कर रिफाइनिंग और तेल उत्पादों की बिक्री तक फैलने लगा.
तकनीक और पेट्रोकेमिकल्स पर जोर
समय के साथ अरामको ने तेल की खोज और उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया. 2000 के बाद कंपनी ने खुद को एक संपूर्ण ऊर्जा और रसायन कंपनी के रूप में विकसित करने पर जोर दिया. इसके तहत तेल उत्पादन के साथ रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स में भी कारोबार बढ़ाया गया. पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल प्लास्टिक और कई औद्योगिक उत्पाद बनाने में होता है. इस रणनीति का मकसद तेल से अधिक आर्थिक फायदा हासिल करना था.
2019 में शेयर बाजार में आई कंपनी
दिसंबर 2019 में अरामको का शुरुआती सार्वजनिक निर्गम (IPO) आया और कंपनी के शेयर सऊदी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुए. इसके बावजूद कंपनी पर सऊदी सरकार का नियंत्रण बना रहा. 2024 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 31 दिसंबर 2024 तक सरकार के पास कंपनी की 81.48 प्रतिशत प्रत्यक्ष हिस्सेदारी थी.
हालिया हमला क्यों अहम है?
अरामको से जुड़ी हालिया हमले की खबर ने कंपनी की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं. कंपनी सऊदी अरब के ऊर्जा कारोबार का अहम हिस्सा है, इसलिए उसके प्रमुख ठिकानों पर सुरक्षा जोखिम का असर बाजार की चिंता पर पड़ सकता है. हालांकि, प्रशासनिक बिल्डिंग को नुकसान होने और तेल का उत्पादन रुकने में फर्क होता है. वास्तविक असर जानने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या तेल उत्पादन केंद्रों, पाइपलाइनों, रिफाइनरियों या सप्लाई व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़ा है. 1933 में तेल खोज समझौते से शुरू हुआ अरामको का सफर तेल उत्पादन, सरकारी नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय निवेश और तकनीकी विकास से गुजरते हुए दुनिया की प्रमुख ऊर्जा कंपनियों तक पहुंचा. आज कंपनी सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और वैश्विक तेल कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हालिया हमले का तेल बाजार पर कितना असर होगा, यह क्षेत्रीय हालात और वास्तविक नुकसान पर निर्भर करेगा.