कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार द्वारा लगभग दो महीने बाद मंत्रिमंडल का विस्तार किए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं तेज हो गई हैं. मंत्रियों की अंतिम सूची जारी होने के बाद पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराज़गी देखने को मिली.

असंतोष का सबसे बड़ा कारण वरिष्ठ कांग्रेस नेता एम. कृष्णप्पा और उनके पुत्र तथा विधायक प्रिया कृष्णा को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिलना बताया जा रहा है. दोनों नेताओं के समर्थकों का आरोप है कि उन्हें कैबिनेट गठन के दौरान जानबूझकर नजरअंदाज किया गया.

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कैबिनेट सूची सामने आने के बाद दोनों नेताओं के समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए और अपने असंतोष का सार्वजनिक रूप से इज़हार किया.

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समर्थकों का कहना है कि एम. कृष्णप्पा कांग्रेस के सबसे मजबूत जमीनी नेताओं में से एक हैं. उन्होंने विजयनगर विधानसभा क्षेत्र से लगातार चार बार जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की है. वहीं उनके पुत्र प्रिया कृष्णा भी तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं और क्षेत्र में मजबूत जनाधार रखते हैं.

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समर्थकों का मानना है कि ऐसे अनुभवी, लोकप्रिय और लगातार चुनाव जीतने वाले नेताओं को पार्टी में उचित सम्मान और जिम्मेदारी मिलनी चाहिए. उनका कहना है कि कांग्रेस को उन जमीनी नेताओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए जिन्होंने वर्षों तक पार्टी को मजबूत करने का काम किया है.

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी के भीतर बढ़ रहे असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया तो यह भविष्य में कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकता है. पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी संगठन में एकजुटता बनाए रखने और वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी दूर करने की होगी.

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इसी बीच कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. उनका मानना है कि यदि मुख्यमंत्री सभी वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं को साथ लेकर नहीं चलते हैं तो इसका असर पार्टी की एकता पर पड़ सकता है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इन मतभेदों को समय रहते नहीं सुलझाया गया तो इसका असर वर्ष 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर पड़ सकता है.

यदि कांग्रेस 2028 के चुनावों में मजबूत स्थिति के साथ उतरना चाहती है तो उसे अपने अनुभवी और जनाधार वाले नेताओं को उचित महत्व देना होगा तथा संगठन के भीतर बढ़ रही नाराज़गी को दूर करना होगा.