असम में एक बार फिर बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. इस हफ्ते आई भीषण बाढ़ के कारण अब तक 68 लोगों की जान जा चुकी है और 15 जिलों में 5.63 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. शिवसागर और तिनसुकिया जैसे इलाके जलमग्न हैं, रेल सेवाएं प्रभावित हुई हैं और खेत-खलिहान डूब चुके हैं. राहत और बचाव कार्य में सेना, NDRF और SDRF की टीमें जुटी हुई हैं. असम में दशकों से हर साल बाढ़ आती रही है, लेकिन 2018, 2020, 2021, 2022 और 2024 में आई आपदाओं ने भारी तबाही मचाई है. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार, असम का लगभग 40% हिस्सा बाढ़ के प्रति बेहद संवेदनशील है. अक्सर लोग इसके लिए सिर्फ भारी बारिश को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन इसके पीछे असम की भौगोलिक बनावट और ब्रह्मपुत्र नदी का स्वरूप सबसे बड़ा कारण है.
ब्रह्मपुत्र नदी और इसकी विशालता
असम पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र नदी के मैदानी क्षेत्र में बसा हुआ है. तिब्बत के पठार से निकलने वाली यह नदी अरुणाचल प्रदेश और असम से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है. रास्ते में इसमें 50 से अधिक सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं. मानसून के दौरान बारिश, हिमालय की बर्फ पिघलने और पहाड़ियों से आने वाली सहायक नदियों के कारण इसमें पानी का बहाव बेहद खतरनाक हो जाता है. असम सरकार के मुताबिक, ब्रह्मपुत्र का औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 20,000 क्यूमेक (प्रति सेकंड हजारों लीटर पानी) होता है.
गाद और मिट्टी से धीमी पड़ती रफ्तार
गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर और शोधकर्ता ध्रुबज्योति सहरिया के अनुसार, मुख्य समस्या नदी के पानी की गति और उसके साथ बहने वाला भारी वजन (गाद) है. ब्रह्मपुत्र दुनिया की उन नदियों में से एक है जो सबसे ज्यादा गाद और मिट्टी बहाकर लाती है.
जब यह नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी इलाकों में आती है, तो इसका ढलान समतल हो जाता है. ढलान कम होने से पानी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, जिससे नदी अपने साथ लाई गई भारी मात्रा में रेत और मिट्टी को आगे नहीं ले जा पाती और उसे अपनी ही तलहटी में जमा करने लगती है.
असम में वनों की अंधाधुंध कटाई
असम में हर साल आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के पीछे केवल बारिश ही नहीं, बल्कि ऊपरी इलाकों में हो रही वनों की कटाई भी बड़ी वजह है. विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों के कटने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है, जिससे नदियों में गाद और मिट्टी जमा होने से भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है.
संवेदनशील जिले और नदियों का खतरा
लखीमपुर, बिश्वनाथ और धेमाजी जैसे जिले भौगोलिक रूप से बाढ़ और कटाव के प्रति बेहद संवेदनशील हैं. ये इलाके सियांग, जियाधल, सुबनसिरी, रंगनाडी और डिक्रोंग जैसी नदियों के दायरे में आते हैं. ये नदियाँ जिन पहाड़ियों से होकर बहती हैं, वे ढीली और रेतीली मिट्टी से बनी हैं. ऐसे में हल्की या तेज बारिश होते ही वहां बड़े पैमाने पर मिट्टी का कटाव और भूस्खलन शुरू हो जाता है. वनों की कटाई ने इस प्राकृतिक समस्या को और विकराल बना दिया है.
बाढ़ प्रबंधन की रणनीति में बदलाव की जरूरत
गुवाहाटी विश्वविद्यालय के भूगोल विशेषज्ञ ध्रुबज्योति सहरिया के अनुसार, अब तक बाढ़ प्रबंधन का पूरा ध्यान निचले इलाकों में तटबंध बनाने जैसे संरचनात्मक उपायों पर ही केंद्रित रहा है. जबकि असल जरूरत ऊपरी इलाकों में काम करने की है, जहाँ मिट्टी के संरक्षण के उपाय किए जाने चाहिए.
असम में क्यों होती है इतनी मूसलाधार बारिश?
असम में हर साल मानसून के दौरान भारी बारिश देखने को मिलती है, जो बाद में भीषण बाढ़ का रूप ले लेती है. असम अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण देश के सबसे नम और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल है. IMD के आंकड़ों के मुताबिक, असम लगातार देश के सबसे ज्यादा बारिश वाले 5 से 7 राज्यों में बना रहता है. असम में हर साल औसतन 2,800 से 3,000 मिमी तक बारिश दर्ज की जाती है. इस कुल बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून यानी जून से सितंबर के बीच ही बरस जाता है.
वैज्ञानिकों ने बताई बारिश की असली वजह
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुनीत दास के अनुसार, असम में इतनी तेज मानसूनी बारिश के पीछे कई मुख्य कारण हैं. निचले वायुमंडल में चलने वाली दक्षिण-पश्चिमी हवाएं बंगाल की खाड़ी से भारी मात्रा में नमी खींचकर लाती हैं. पहाड़ियों से घिरे होने के कारण बादल यहाँ आकर रुक जाते हैं और जमकर बरसते हैं. चक्रवाती परिसंचरण और उत्तर-पूर्व में मानसून गर्त की मौजूदगी से यहाँ बारिश की स्थिति और मजबूत हो जाती है. भूगोल विशेषज्ञ ध्रुबज्योति सहरिया के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ का स्तर और तबाही की तीव्रता पहले से कहीं अधिक खतरनाक और जानलेवा होती जा रही है.
असम में क्यों फेल हो रहे हैं 70 साल पुराने तटबंध?
असम में हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ से निपटने के लिए दशकों से तटबंधों का सहारा लिया जाता रहा है, लेकिन अब यही तटबंध तबाही का बड़ा कारण बन रहे हैं. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार, 1950 के दशक से अब तक राज्य ने ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर 423 तटबंध बनाए हैं. चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग 295 तटबंध अपनी तय आयु सीमा पार कर चुके हैं, जिससे इनमें बार-बार दरारें पड़ती हैं और आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं.
दशकों में बढ़ा मौतों और नुकसान का आंकड़ा
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 से 2022 के बीच बाढ़ के कारण कम से कम 838 लोगों की जान गई, जिसमें अकेले 2022 में रिकॉर्ड 181 मौतें हुईं. एशियन डिजास्टर रिडक्शन सेंटर (ADRC) का डेटा बताता है कि 1950 के दशक में जहाँ बाढ़ से हर साल औसतन 8.6 लाख लोग प्रभावित होते थे, वहीं 2000 के दशक की शुरुआत तक यह संख्या बढ़कर 45 लाख से अधिक हो गई. इस दौरान राज्य में आर्थिक नुकसान भी 120 गुना से ज्यादा बढ़ चुका है.
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