दुनिया के जाने-माने रणनीतिक सलाहकार और अल्फाजियो के सीईओ पराग खन्ना ने दावोस में भारत की विदेश नीति को लेकर बड़ी बात कही है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की नीतियां किसी ऊंचे आदर्श या दिखावे के बजाय ठोस आर्थिक सच्चाइयों पर आधारित हैं. खन्ना के अनुसार रूस के साथ भारत के रिश्ते इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं कि दिल्ली केवल अपने हितों की रक्षा करती है. उन्होंने याद दिलाया कि बाइडन प्रशासन ने भी भारत पर रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में शामिल होने के लिए भारी दबाव बनाया था लेकिन भारत अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ. खन्ना का मानना है कि भारत को किसी भी गुट में शामिल होने के लिए मजबूर करना नामुमकिन है क्योंकि वह अपनी जरूरतों को सबसे ऊपर रखता है.
लोकतंत्र के नाम पर दबाव डालना होगा नाकाम
एनडीटीवी से बातचीत में पराग खन्ना ने कहा कि लोकतंत्र के नाम पर भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने की कोशिशें कभी सफल नहीं होंगी. उन्होंने बताया कि भारत एक ऐसा देश है जिसका व्यापार घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल और अन्य जरूरी सामानों के आयात की वजह से होता है. ऐसे में भारत की पहली प्राथमिकता अपने बजट और आम जनता को मिलने वाली सब्सिडी को बचाना है न कि किसी विदेशी दबाव के आगे झुकना. खन्ना ने तंज कसते हुए कहा कि कोई भी समझदार भारतीय नेता अंतरराष्ट्रीय आदर्शों के लिए अपने देश की अर्थव्यवस्था और सस्ती ऊर्जा के स्रोतों का बलिदान कभी नहीं करेगा. भारत इस मामले में दुनिया के उन देशों की सूची में सबसे ऊपर है जो अपनी जरूरतों के हिसाब से कूटनीति तय करते हैं.
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मल्टी-अलाइनमेंट की दौड़ में दुनिया
पराग खन्ना ने दावा किया कि अपनी जरूरतों के लिए रूस से तेल या गैस लेना सिर्फ भारत की बात नहीं है बल्कि पूरी दुनिया ऐसा कर रही है. उन्होंने उदाहरण दिया कि जापान जैसा कट्टर अमेरिकी सहयोगी भी रूसी ऊर्जा हासिल करने के लिए कई रास्ते निकाल रहा है. यहां तक कि यूरोप ने भी पाइपलाइन फटने के बाद भारतीय रिफाइनरियों के जरिए रूसी तेल का इस्तेमाल जारी रखा है. खन्ना के मुताबिक आज का दौर ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ का है जहां हर देश एक साथ कई ताकतों से जुड़ा रहता है लेकिन अपनी शर्तों पर काम करता है. भारत इस खेल को बहुत चतुराई से खेल रहा है और उसने दुनिया को दिखा दिया है कि वह किसी के निर्देश पर चलने वाला देश नहीं है.
स्वाभिमान पर भारत का फोकस
भारत की बढ़ती ताकत पर टिप्पणी करते हुए खन्ना ने कहा कि दिल्ली को अपने पड़ोस और क्षेत्रीय सुरक्षा पर ध्यान देना है न कि दूसरों की लड़ाइयों का हिस्सा बनना है. भारत ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है और वह किसी भी महाशक्ति के आदेश लेने के बजाय बराबरी के स्तर पर बातचीत करता है. खन्ना ने भारत के इस रुख को काफी चालाकी भरा और सही बताया क्योंकि इससे देश का आर्थिक और रणनीतिक स्वाभिमान बना रहता है. अंत में उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी दबाव भारत के मामले में इसलिए काम नहीं करता क्योंकि भारत की जड़ें अपनी आर्थिक मजबूती और घरेलू हितों में बहुत गहरी हैं. भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अपनी कूटनीति का रास्ता खुद चुनने में सक्षम है.
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