SC on euthanasia: 11 मार्च का दिन सुप्रीम कोर्ट के लिए बेहद अहम और भावुक भरा रहा है। कोर्ट ने हरियाणा के हरीश राणा की इच्छा मृत्यु की मांग को स्वीकार कर लिया है। इसकी वजह है उनकी लाइलाज बीमारी। हरीश राणा 13 साल से कोमा में हैं। उन्हें सांस लेने, खाना खाने के लिए भी मशीनों की मदद लेनी पड़ रही है। डॉक्टर भी कह चुके हैं कि हरीश की स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इसको देखते हुए परिवार की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की मंजूरी दे दी है। यह सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला है। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार ये फैसला दिया है।

हरीश राणा मूल रूप से हरियाणा के रहने वाले हैं। 13 साल पहले जब हादसा हुआ था तब हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे। कॉलेज के समय हरीश को बॉडीबिल्डिंग का काफी शौक था। वह हमेशा अपनी फिटनेस को लेकर सतर्क रहते थे। 20 अगस्त 2013 को अपने पीजी की चौथी मंजिल से हरीश अचानक नीचे गिर गए।

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हादसे के बाद हरीश को बचाने के लिए परिवार ने काफी कोशिश की लेकिन बेनतीजा रही। पिता अशोक राणा हरीश को चंडीगढ़ PGI से दिल्ली AIIMS और देश के कई नामी प्राइवेट अस्पतालों तक ले गए। डॉक्टरों के मुताबिक सिर में गंभीर चोट की वजह से हरीश के दिमाग की नसें सूख गई हैं। पिछले 13 सालों से उनके शरीर में कोई हलचल नहीं है। हरीश न कुछ महसूस कर सकते हैं और न ही बोल सकते हैं। बस पलकें झपकती हैं। यही उनके जिंदा होने का सबूत है।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस ऐतिहासिक फैसला को सुनाया। हालांकि फैसला सुनाते समय दोनों की आंखें नम थीं। अब दिल्ली एम्स (AIIMS) को निर्देश किया गया है कि हरीश राणा को तुरंत भर्ती किया जाए। लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

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