क्या है SEM कोर्ट? जहां अटकी है सौरव और रांका की रिहाई, सामान्य अदालत से अलग कैसे?

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के मामले में गिरफ्तार CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई पर सस्पेंस बना हुआ है. दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका वापस होने के बाद अब नजरें स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं. क्या होती है यह पुलिस थाने वाली अदालत और आम कोर्ट के मुकाबले कितनी सीमित हैं इसकी शक्तियां.

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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के मामले में गिरफ्तार CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई पर सस्पेंस बना हुआ है. Credit: PTI

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सौरव दास और आशुतोष रांका को 7 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद क्या आज स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट यानी SEM कोर्ट से राहत मिल पाएगी या नहीं, सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं? इससे पहले बुधवार दोपहर दिल्ली हाईकोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई हुई. अदालत ने साफ लहजे में सवाल किया कि जब कानून में अपील और दूसरे कानूनी रास्ते पहले से मौजूद हैं तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट क्यों पहुंचे? अदालत के इस रुख के बाद दोनों नेताओं ने हिरासत बढ़ाने के आदेश के खिलाफ दायर अपनी याचिका वापस ले ली.
गौरतलब है कि सौरव दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था तोड़ने और जबरन जंतर-मंतर में घुसने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. सोमवार को SEM ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी थी.

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क्या होता है SEM कोर्ट और इसका काम?

SEM का पूरा नाम ‘स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट’ है. पेशी के दौरान सौरव दास ने इसे ‘पुलिस कोर्ट’ कहते हुए सवाल भी उठाए थे. यह कोई नियमित न्यायिक अदालत नहीं है. इसका मुख्य काम इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और एहतियाती कदम उठाना है. यहां के मजिस्ट्रेट के अधिकार काफी सीमित होते हैं. वे इलाके में शांति भंग होने से रोकने के लिए कदम तो उठा सकते हैं, लेकिन किसी नियमित आपराधिक मुकदमे की अंतिम सुनवाई नहीं कर सकते.

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रेगुलर कोर्ट से कितनी अलग है यह व्यवस्था?

  • शांति बनाए रखने का अधिकार: BNSS की धारा 126 से 143 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को शांति भंग की आशंका होने पर किसी भी व्यक्ति से ‘पीस बॉन्ड’ भरवाने का अधिकार है.
  • जांच का सीमित दायरा: यदि कोई व्यक्ति इस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तब धारा 130 के तहत मजिस्ट्रेट जांच शुरू करते हैं. यानी इनका पूरा काम बॉन्ड भरवाने और उसके पालन तक ही सीमित रहता है.
  • थाने में कोर्ट: कई बार SEM का दफ्तर किसी थाने के भीतर ही बनाया जाता है, जिसे बोलचाल में ‘थाने का SEM कोर्ट’ कहते हैं. सौरव और आशुतोष के मामले की सुनवाई भी मंदिर मार्ग थाने स्थित SEM कोर्ट में हुई. हालांकि इनका अधिकार क्षेत्र थाने के हिसाब से नहीं बल्कि पूरे जिले या इलाके के आधार पर तय होता है.

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Vijay Jain

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विजय कुमार न्यूज 24 में बतौर सीनियर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. विजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत प्रिंट मीडिया के साथ की. अपने 23 साल के करियर में वह दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं. विजय कुमार राजनीति, चुनाव, क्राइम और करंट अफेयर्स जैसे विषयों पर तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. विजय कुमार ने दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग के दौरान स्टिंग ऑपरेशन भी किए. 23 साल के अनुभव के दौरान विजय कुमार ने करियर के शुरुआती दौर में डेस्क जर्नलिस्ट रहते हुए की. विजय कुमार को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव की ग्राउंड कवरेज का अनुभव है. ग्रामीण उद्योगीकरण में स्नातक की डिग्री होने के कारण विजय कुमार को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और उनसे जुड़ी कवरेज का खासा अनुभव है. अपने लेख के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है. पत्रकारिता में अनुभव: 23 साल योग्यता, डिग्री / अन्य उपलब्धियां: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ग्रामीण उद्योगीकरण विषय में बीए की डिग्री प्राप्त की है. विजय कुमार को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2017 में 'श्रीफल जर्नलिज्म नेशनल अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
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