सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लिफ्ट में होने वाली किसी भी दुर्घटना को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी लिफ्ट में दुर्घटना होती है तो ऐसे में लिफ्ट बनाने वाली कंपनी, रखरखाव करने वाली एजेंसी और उस बिल्डिंग के मालिक या प्रबंधन तीनों संयुक्त रूप से यात्रियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार माने जाएंगे और उन पर कार्रवाई की जाएगी.
अदालत ने लिफ्ट को “comman carrier” यानी सार्वजनिक परिवहन की श्रेणी का माना और साफ किया कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इन सभी की प्राथमिक जिम्मेदारी है.
बता दें कि जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने Otis एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड की अपील खारिज कर दी और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के 2014 के आदेश को बरकरार रखा.
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के उस आदेश को सही माना जिसमें हांडा की पत्नी और दो बच्चों को ₹3.01 करोड़ मुआवजा दिए जाने का निर्देश था. अदालत ने हादसे की तिथि 20 मार्च 2003 से 9% सालाना ब्याज जोड़ने और अगर 90 दिनों के भीतर भुगतान नहीं हुआ तो 12% वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया गया है.
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि साल 2003 में 20 मार्च के दिन नई दिल्ली स्थित रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के मुख्यालय में एक दर्दनाक हादसा हुआ था. उस समय 13 अधिकारी लिफ्ट से नीचे जा रहे थे, तभी लिफ्ट छठी और सातवीं मंजिल के बीच अचानक रुक गई. इसके बाद सभी को सुरक्षित निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया. इसी दौरान पूर्व राजनयिक विपिन हांडा जब लिफ्ट से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे और उनका शरीर आधा बाहर आ चुका था, तभी लिफ्ट अचानक नीचे की ओर सरक गई. इस दौरान उनका सिर लिफ्ट और मंजिल के बीच बुरी तरह फंस गया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई.
कंपनी ने अपनी सफाई में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान ओटिस कंपनी ने SC के सामने दलील दी कि यह दुर्घटना रेस्क्यू ऑपरेशन के समय हुई मानवीय चूक के कारण हुई थी. कंपनी का कहना था कि उसने पहले ही भवन में बिजली के वोल्टेज में होने वाले उतार-चढ़ाव को देखते हुए 50 केवीए का स्टेबलाइजर लगाने की बात कही थी, लेकिन संबंधित पक्ष ने इस सुझाव पर अमल नहीं किया था.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना. अदालत ने कहा कि किसी हादसे की जिम्मेदारी तय करते समय केवल अंतिम घटना या तत्काल कारण को आधार नहीं बनाया जा सकता है. रिकॉर्ड से यह साफ होता है कि लिफ्ट में लंबे समय से तकनीकी खामियां थी और ओटिस कंपनी को इस स्थिति के बारे में पूरी जानकारी थी. इसके बाद भी कंपनी ने न तो पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए और न ही लिफ्ट को उपयोग के लिए रोका गया.
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कोर्ट ने दिया ये आदेश
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी माना कि मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) रखरखाव कार्यों की प्रभावी निगरानी करने में विफल रही है. वहीं, भवन के उपयोगकर्ता और प्रबंधन की जिम्मेदारी निभा रही RAW ने भी लगातार मिल रही शिकायतों के बावजूद समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए. इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा तय की गई जवाबदेही को बरकरार रखा. इसके तहत मुआवजे का 70 प्रतिशत भुगतान ओटिस एलिवेटर कंपनी, 25 प्रतिशत मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) और शेष 5 प्रतिशत RAW को देना होगा.
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