सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अगर आपसी सहमति से बने रिश्ते के बाद कोई प्रेमी शादी करने से इनकार कर देता है और इसके बाद महिला आत्महत्या कर लेती है, तो सिर्फ इस वजह से इसे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता. इसी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में छह लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि मामले के रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर किया या उसे इसके लिए उकसाया था.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला तेलंगाना के मेडचल-मलकाजगिरी जिले का है. मृतका करीब तीन महीने तक अपने कथित प्रेमी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही थी. महिला के भाई-बहनों का आरोप था कि प्रेमी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली. महिला की बहन की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, दोनों का रिश्ता आपसी सहमति से बना था. आरोप था कि प्रेमी के एक दोस्त ने महिला के बारे में गलत बातें कहीं और उसके परिवार वाले भी इस रिश्ते के खिलाफ थे. यह भी कहा गया कि प्रेमी की शादी की वजह से महिला का रिश्ता कहीं और तय नहीं हो पा रहा था, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि आत्महत्या से ठीक पहले महिला ने अपनी बड़ी बहन को फोन कर बताया था कि उसके प्रेमी ने शादी से इनकार कर दिया है. हालांकि, अदालत ने कहा कि सिर्फ यह तथ्य आरोपियों को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों का महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने का इरादा था.
अदालत ने यह भी कहा कि हर व्यक्ति किसी मुश्किल परिस्थिति पर अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है. इसलिए अगर ब्रेकअप या रिश्ते के खत्म होने के बाद कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, तो हर मामले में इसे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता. इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने छह आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी.