दुनिया के दिग्गज स्टील कारोबारी लक्ष्मी मित्तल के पिता मोहन लाल मित्तल का 15 जनवरी को लंदन में निधन हो गया. मोहन लाल के निधन के बाद मित्तल परिवार और उद्योग जगत की दिग्गज हस्तियां शोक में हैं. असाधारण व्यक्तित्व और अगाध बुद्धिमत्ता के धनी मोहन लाल को जानने वाले लोग उन्हें अक्सर एक सच्चा ‘कर्मयोगी’ कहते थे. एक ऐसा व्यक्ति जिनका जीवन निस्वार्थ कर्म और कर्तव्य के प्रति समर्पण के दर्शन का जीता-जागता प्रमाण था. वह 99 वर्ष के थे और उद्योग जगत में एक प्रेरणादायक शख्सियत के तौर पर जाने जाते थे. उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा दुख जताया और कहा कि मोहन लाल मित्तल ने न केवल उद्योग जगत में अपनी अलग पहचान बनाई बल्कि वे भारतीय संस्कृति और समाज सेवा के प्रति भी बहुत समर्पित थे. आर्सेलर मित्तल के कार्यकारी अध्यक्ष लक्ष्मी मित्तल ने अपने पिता को एक ‘असाधारण’ इंसान बताया जिनका जन्म राजस्थान के राजगढ़ नामक एक छोटे से गांव के साधारण परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से यह साबित किया कि कड़ी मेहनत ही हर समस्या का समाधान है.
कोलकाता से शुरू हुआ स्टील का कारोबार
मोहन लाल मित्तल का स्टील उद्योग में सफर साल 1952 में शुरू हुआ था जब उन्होंने कोलकाता में एक बंद पड़ी स्टील मिल की कमान अपने हाथों में ली थी. उनकी दूरदर्शिता और व्यापारिक समझ अपने समय से काफी आगे थी. साल 1974 में जब भारत के घरेलू बाजार में कुछ पाबंदियां लगीं तब उन्होंने अपने बेटे लक्ष्मी मित्तल को इंडोनेशिया में एक स्टील मिल चलाने के लिए भेजा. यहीं से ‘इस्पात ग्रुप’ की शुरुआत हुई जिसने आगे चलकर एक विशाल ग्लोबल स्टील साम्राज्य का रूप ले लिया. मोहन लाल हमेशा अपने बच्चों को कुछ नया करने और जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करते थे ताकि वे अपनी सीमाओं को और बड़ा कर सकें.
पिता का वो मंत्र जिसने बनाया लक्ष्मी मित्तल को दुनिया का स्टील किंग
लक्ष्मी मित्तल ने भावुक होकर बताया कि वह आज भी अपने पिता के साथ बिजनेस की चुनौतियों और मुद्दों पर चर्चा किया करते थे. उनके पिता का मानना था कि अगर उनके बेटे उनसे बेहतर साबित नहीं हुए तो उनका बिजनेस खत्म हो जाएगा. यही वजह थी कि उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा साहसी और समय से आगे रहने की सीख दी. मशहूर किताब ‘कोल्ड स्टील’ में भी मोहन लाल मित्तल के सिद्धांतों का जिक्र मिलता है जिसमें बताया गया है कि कैसे उनके मार्गदर्शन ने लक्ष्मी मित्तल को यूरोपीय स्टील कंपनी आर्सेलर को खरीदने की बड़ी जंग में जीत दिलाने में मदद की. पिता की दी हुई इसी हिम्मत के दम पर उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय उद्योग का लोहा मनवाया.
समाज सेवा के प्रति लगाव
मोहन लाल मित्तल केवल व्यापार तक सीमित नहीं थे बल्कि समाज के उत्थान और चैरिटी के कामों में भी उनकी गहरी रुचि थी. उन्होंने कई परोपकारी संस्थाओं का समर्थन किया और हमेशा सामाजिक प्रगति के लिए सक्रिय रहे. उनके जाने से मित्तल परिवार और उद्योग जगत में एक बड़ा खालीपन आ गया है. वह अपने पीछे अपने पांच बच्चे, पोते-पोतियां और पड़पोते-पोतियों का एक भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनकी जीवन गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए इस बात का सबूत है कि एक छोटे से गांव से निकलकर भी कोई इंसान अपनी काबिलियत और सोच के दम पर पूरी दुनिया के व्यापारिक नक्शे को बदल सकता है.
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