भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है, पूरी दुनिया जानती है, लेकिन अब भारत में राज्य ध्वज की मांग होने लगी है. जी हां, तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की TVK सरकार में मंत्री अधव अर्जुन ने केंद्र सरकार से प्रदेश के लिए अलग झंडे की मांग की है, लेकिन भाजपा ने उनकी मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. वैसे तमिलनाडु में अलग राज्य ध्वज की मांग का इतिहास दशकों पुराना है. 1970 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने केंद्र सरकार के सामने राज्य ध्वज का प्रस्ताव पेश किया था.इसमें राज्य ध्वज के कोने में तिरंगा और मेन हिस्से में तमिलनाडु का राजकीय प्रतीक (श्रीविल्लीपुत्तुर गोपुरम) अंकित था. लेकिन तब केंद्र सरकार ने प्रस्ताव रिजेक्ट किया था.
संविधान में राज्य ध्वज को लेकर कानून नहीं
बता दें कि भारतीय संविधान में राष्ट्रीय ध्वज के अलावा राज्यों के लिए अलग झंडे को लेकर कोई नियम, प्रतिबंध या प्रावधान नहीं किया गया है. 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने SR बोम्मई बनाम भारत केस में फैसला दिया था कि सांस्कृतिक पहचान वाले झंडे पर कोई रोक नहीं है, लेकिन वह राष्ट्रीय ध्वज का अपमान न करे. इसका मतलब यह है कि भारत में सांस्कृतिक या क्षेत्रीय पहचान के लिए अलग झंडा हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की जगह नहीं ले सकता. फ्लैग कोड ऑफ इंडिया और प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट के अनुसार, तिरंगे के साथ कोई दूसरा झंडा नहीं लगेगा, न फहराया जाएगा और न ही तिरंगे से ऊपर कोई झंडा लगेगा.
किस-किस राज्य ने की है अलग झंडे की मांग?
बता दें कि तमिलनाडु से पहले 2 राज्य कर्नाटक और नागालैंड सांस्कृतिक पहचान, क्षेत्रीय गौरव और भाषाई अस्मिता के आधार पर अलग राज्य ध्वज की मांग कर चुके हैं. 1960 के दशक से कर्नाटक में पीले और लाल रंग वाले ‘कन्नड़ ध्वज’ का इस्तेमाल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में किया जा रहा है, लेकिन वह आधिकारिक नहीं है.
2018 में सिद्धारमैया की सरकार ने आधिकारिक राज्य ध्वज का प्रस्ताव बनाया था, जिसमें पीला, सफेद और लाल रंग के झंडे के सेंटर में राज्य प्रतीक ‘गंडबेरुंड’ (दो सिर वाला पक्षी) बना था. लेकिन यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया. नवंबर 2026 में कन्नड़ राज्योत्सव के दौरान उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने संकेत दिया है कि वे शीतकालीन सत्र में सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ कन्नड़ ध्वज फहराने को कानूनी मान्यता देने वाला प्रस्ताव लाएंगे.
पूर्वोत्तर भारत के राज्य नागालैंड ने भी अलग ध्वज की मांग की है, लेकिन उनकी मांग तमिलनाडु और कनार्टक की मांग से अलग और राजनीतिक तौर पर संवदेनशील है. नागालैंड के लिए अलग राष्ट्रीय ध्वज की मांग हुई है. नागालैंड में उग्रवादी संगठन NSCN-IM नागालैंड के लिए अलग संविधान और अलग राष्ट्रीय ध्वज की मांग पर अड़ा है. लेकिन केंद्र सरकार ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नागालैंड के झंडे का इस्तेमाल करने की छूट दी है, इसे आधिकारिक ध्वज की मान्यता देने से इनकार किया है.
जम्मू-कश्मीर में 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने से पहले अपना आधिकारिक संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त राज्य ध्वज था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. जम्मू-कश्मीर का राज्य ध्वज लाल रंग का था, जिस पर हल और 3 सफेद पट्टियां थीं. अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने और विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद राज्य ध्वज को हटाकर उसका अस्तित्व खत्म कर दिया गया.
भारत में तिरंगे के लेकर क्या नियम और शर्तें?
बता दें कि भारत में संविधान के तहत भारतीय ध्वज संहिता 2002 लागू है, जिसके तहत राज्य, संस्था या संगठन के लिए राष्ट्रीय तिरंगे के साथ अपना झंडा फहराने को लेकर नियम तय किए गए हैं. नियमों के अनुसार तिरंगा कभी भी राज्य ध्वज के नीचे नहीं होगा, यानी तिरंगे के ऊपर कोई दूसरा ध्वज नहीं होगा. एक पोल पर तिरंगे के साथ उसके बराबर में दूसरे पोल पर साथ-साथ कोई दूसरा ध्वज नहीं फहराया जाएगा.
जब ध्वज सीधी रेखा में लगाए जाएंगे तो तिरंगे को दाईं तरफ सबसे पहले रखा जाएगा, जो दर्शकों की तरफ से बाईं ओर होगा. तिरंगा दूसरे ध्वज के मुकाबले ऊंचे पोल पर लगा होगा. दूसरे ध्वज का साइज तिरंगे से ज्यादा नहीं होना चाहिए, छोटा या बराबर साइज का हो सकता है. तिरंगे पर कोई प्रतीक, फूल, माला या प्रचारात्मक सामग्री रखने या तिरंगे के पोल से जोड़ने की भी मनाही है.
तिरंगे का अपमान करने पर सजा क्या होगी?
संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को लेकर सजा का प्रावधान किया गया है. कानून की धारा 2 के तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के ऊपर किसी दूसरे ध्वज को रखता है या किसी और तरीके से तिरंगे का अपमान करता है तो 3 साल तक की जेल की सजा, जुर्माना या फिर दोनों झेलना पड़ सकता है.