भारतीय पासपोर्ट को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है. इस बीच चुनाव आयोग का एक बड़ा बयान सामने आया है. आयोग ने गुरुवार को साफ कर दिया है कि वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराने या उसे बरकरार रखने के लिए भारतीय पासपोर्ट आज भी पूरी तरह से मान्य है..
बता दें कि यह उन 12 जरूरी दस्तावेजों में से एक है, जिसे दिखाकर कोई भी व्यक्ति वोटर लिस्ट में अपनी पात्रता साबित कर सकता है. चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने कहा कि पासपोर्ट पहले भी पहचान साबित करने का एक जरिया था और आज भी है. इसके नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. बिहार और असम में हाल ही में हुए मतदाता सूची के विशेष सुधार अभियानों में भी पासपोर्ट को मान्य दस्तावेजों की लिस्ट में रखा गया था.
भारतीय पासपोर्ट को आम तौर पर देश की नागरिकता का सबसे मजबूत दस्तावेज माना जाता रहा है. इसी के आधार पर कोई व्यक्ति विदेश यात्रा करता है, दूसरे देशों के इमिग्रेशन अधिकारियों के सामने अपनी राष्ट्रीयता बताता है और विदेशों में भारतीय दूतावास से कांसुलर सहायता की मांग करता है. ऐसे में विदेश मंत्रालय का यह कहना कि पासपोर्ट नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है, स्वाभाविक रूप से लोगों को चौंकाता है। सवाल यह है कि यदि पासपोर्ट, आधार, पैन या मतदाता पहचानपत्र भी अकेले नागरिकता साबित नहीं करते, तो एक भारतीय अपनी नागरिकता कैसे सिद्ध करेगा?
पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट का मूल उद्देश्य यात्रा को सुगम बनाना है. सरकार के अनुसार यह रुख नया नहीं है. भारतीय कानून में लंबे समय से पासपोर्ट और नागरिकता के बीच अंतर रखा गया है.
क्यों हो रहा पासपोर्ट पर विवाद?
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत सामान्य नियम यही है कि भारतीय नागरिक को पासपोर्ट जारी किया जाता है. आवेदन के बाद पासपोर्ट प्राधिकरण पहचान, पते और अन्य तथ्यों की जांच करता है. यदि आवेदक भारतीय नागरिक नहीं है तो पासपोर्ट देने से मना किया जा सकता है.
लेकिन इसी कानून की धारा 20 केंद्र सरकार को असाधारण परिस्थितियों में गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने की अनुमति देती है, बशर्ते सरकार इसे जनहित में जरूरी माने. यही अपवाद सरकार के तर्क का आधार है. यानी पासपोर्ट नागरिकता का बहुत महत्वपूर्ण संकेत और व्यवहार में मजबूत दस्तावेज हो सकता है, पर कानून की भाषा में उसे हर विवाद में अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जा सकता है.
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ये दस्तावेज हैं शामिल
सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी बर्थ सर्टिफिकेट, पासपोर्ट, मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा जारी मैट्रिक या अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, फॉरेस्ट राइट सर्टिफिकेट तथा जाति प्रमाण पत्र भी बतौर प्रमाण स्वीकार किए जाएंगे. सरकारी नियमों के तहत तैयार परिवार का रेकॉर्ड, भूमि या मकान आवंटन प्रमाण पत्र, आयोग के निर्देशों के अनुसार आधार भी दस्तावेज के रूप में दिया जा सकता है.
नागरिकता का फैसला किस कानून से होता है?
भारत में नागरिकता संविधान के प्रविधानों और मुख्य रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 से तय होती है. इस कानून के तहत नागरिकता पांच आधारों पर मिल सकती है.
- जन्म से
- वंश से
- पंजीकरण से
- देशीयकरण (नेचुरलाइजेशन) से
- किसी क्षेत्र के भारत में शामिल होने से
- नागरिकता अधिनियम की धारा 3 के अनुसार जन्म से नागरिकता की शर्तें जन्म-तिथि के साथ बदलती हैं.
- जन्म की अवधि-जन्म से नागरिकता की कानूनी स्थिति
- 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 से पहले- भारत में जन्म सामान्यतः पर्याप्त आधार
- 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 से पहले- जन्म के समय माता-पिता में से कम-से-कम एक भारतीय नागरिक होना जरूरी
- 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद- दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों, या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 1987 के बाद जन्मे हर व्यक्ति के लिए केवल जन्म प्रमाणपत्र नागरिकता का अंतिम प्रमाण है. जन्म प्रमाणपत्र जन्म की तारीख और स्थान साबित करता है, लेकिन संबंधित अवधि के कानून के अनुसार माता-पिता की नागरिकता या उनकी कानूनी स्थिति के दस्तावेज भी जरूरी हो सकते हैं.
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