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OPINION 24: क्या खत्म हो गया है "कर्नाटक संकट", पढ़िये सुकेश रंजन की विवेचना!

Siddaramaiah Vs Shivakumar: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हों या उनके डिप्टी डीके शिवकुमार दोनों ने हाईकमान का फैसला मानने की बात की है.

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कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चल रही खींचतान की कमान एक बार फिर से कांग्रेस हाईकमान के पास पहुंच गई है. शनिवार को वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद अब गेंद कांग्रेस हाईकमान के पाले में वापस पहुंच गई है. प्राप्त जानकारी के मुताबिक नाश्ते के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये तो पता चल गया कि दिसंबर में होने वाले कर्नाटक विधानसभा सत्र से पहले सीएम की कुर्सी का हस्तांतरण नहीं होगा. हालांकि तकरार पूरी तरह खत्म हो गई है, इस बात की भी पुष्टि नहीं की जा सकती.

एक बार फिर हाईकमान के पाले में गेंद

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हों या उनके डिप्टी डीके शिवकुमार दोनों ने हाईकमान का फैसला मानने की बात की है. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है, वो साथ मिलकर 2028 भी जीतेंगे, लेकिन ऐसा संकेत नहीं मिला कि नाश्ते के बाद दोनों में से किसी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपना क्लेम वापस ले लिया हो. वहीं, कांग्रेस हाईकमान ने इतने वक्त का जुगाड़ कर लिया कि समय रहते वो इस विवाद का निपटारा कर पायें. अब सवाल ये है कि क्या ये वक्त काफी होगा?

135 सीटें जीतकर कांग्रेस ने बनाई सरकार

2023 में 135 सीटें जीतकर कांग्रेस ने दक्षिण के इस किले को भेद लिया था. आम लोगों के लिये तमाम योजनाओं का वादा कर सत्ता में आई कांग्रेस इस प्रदेश को एक ऐसे मॉडल स्टेट की तरह चलाने के दावे के साथ आई थी कि वो एक ऐसे कल्याणकारी स्टेट की नजीर बन सकें जो कांग्रेस की नई पॉलिसी का प्रतिबिंब हों, जो मोदी और बीजेपी शासित प्रदेशों से ज्यादा जनमुखी दिखें. चुनाव के दौरान किये गये वादों के वजन तले जूझ रही कांग्रेस की कमान 77 के हो चुके सिद्धारमैया के पास है, वे कुरबा जाति से आते हैं. ये पिछड़ी जाति है और जनसंख्या के हिसाब से पूरे प्रदेश में 8 फीसदी के आसपास हैं.

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सिद्धारमैया से मिलते हुए डीके शिवकुमार.

कर्नाटक के लोकप्रिय नेता हैं सिद्धारमैया

सिद्धारमैया घुटे हुए नेता माने जाते हैं जिनकी अपनी लोकप्रियता पूरे कर्नाटक में है. ओबीसी जाति से आने की वजह से वे कांग्रेस की नई पिछड़ी राजनीति के प्रयोग में फिट भी बैठते हैं लेकिन उनके चैलेंजर डीके शिवकुमार कांग्रेस के खांटी नेता हैं, जो गांधी फैमिली के लॉयलिस्ट माने जाते हैं. कुछ जानकार उन्हें कांग्रेस का एटीएम भी कहते हैं. कांग्रेस जब सत्ता में आयी तो वही प्रदेश में अध्यक्ष भी थे और इस नाते जाहिर तौर पर उनका दावा कमजोर तो नहीं है. जुबान की कीमत की बात कर और फिर इस तरफ इशारा कर कि उन्हें ये भरोसा दिया गया था कि ढाई साल बाद सीएम की कुर्सी मिलेगी, वो मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा जाहिर कर चुके हैं.

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सिद्धारमैया को हटाने से क्या होगा नुकसान?

कांग्रेस इसको तौल कर देख रही है कि क्या सिद्धारमैया को हटाने से उनकी नई पॉलिटिकल फिलिसोफी पर असर तो नहीं पड़ेगा क्योंकि जातिगत जनगणना से लेकर प्राईवेट क्षेत्र में आरक्षण की बात राहुल गांधी हर मंच से कर रहे हैं. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ये भरोसा दिला चुके हैं कि जल्द ही वो कर्नाटक में राहुल गांधी की विश लिस्ट को पूरा करेंगे. राहुल उसे अपने प्रोडक्ट की तरह पूरे देश में बेचना चाहेंगे. ऐसे में 63 साल के डी के शिवकुमार को और प्रतीक्षा करनी होगी. वोकालिगा समाज से आने वाले डी के को मालूम है कि उनकी स्टेंथ क्या है. वे उस समाज से आते हैं जो दशकों से देवेगौडा और उनके बेटे कुमारास्वामी के साथ है.

पत्रकारों को संबोधित करते हुए सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार.

2023 के चुनावों में महज 19 सीटें जीतने के बाद कमजोर कुमारास्वामी को एक बार फिर बीजेपी का हाथ थामना पड़ा था. शिवकुमार जानते हैं कि उनकी मूल ताकत उनकी बिरादरी है जो कर्नाटक में 10 से 11फीसदी के बीच है और जिनकी चाहत है कि कोई उनका नुमाइंदा सीएम की कुर्सी पर बैठे. मतलब खेल दिलचस्प है और ये नाश्ता डिप्लोमेसी सिर्फ इन्टरवल है पूर्ण विराम नहीं.

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कांग्रेस के लिए कर्नाटक बेहद अहम

बड़े राज्य के तौर पर सिर्फ कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस का शासन है. कांग्रेस को मालूम है कि हाल के दशकों में कई बार सत्ता में आ चुकी बीजेपी यहां मजबूत तो हुई है लेकिन अभी भी पूरे कर्नाटक में उसकी समान पकड़ नहीं है. कांग्रेस को ये भी मालूम है कि येदुयुरप्पा के बाद बीजेपी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसका बड़ा जनाधार हो. येदुयुरप्पा लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं और बुजुर्ग येदुयुरप्पा का कोई विकल्प बीजेपी ने तैयार नहीं किया है. कांग्रेस ये जानती है कि दक्षिण का ये किला दरका तो कई स्तर पर उसका नुकसान तय है.

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पॉलिटिकल स्पेस के लिये जूझ रही कांग्रेस

पहला- राहुल गांधी का पूरा नैरेटिव धाराशाही होगा. जातिगत जनगणना से लेकर आमलोगों और महिलाओं के लिये किये गये वादों पर सवाल उठेगा. कहा जायेगा कांग्रेस हवा हवाई बातें करती है. दूसरे प्रदेशों में ऐसी घोषनायें फिर मजाक का पात्र बन जायेंगी. नई पॉलिटिकल स्पेस के लिये जूझ रही कांग्रेस के सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा होगा कि अब कौन सी राजनीति की तरफ देखा जाये. कुल मिलाकर गवर्नेंस से लेकर political maneuvering तक, कर्नाटक कांग्रेस के लिये एक टेस्ट केस होने जा रहा है.

125 साल पुरानी पार्टी क्यों हुई कमजोर?

सवाल ये उठता है कि एक के बाद एक ऐसा कांग्रेस के साथ ही क्यों होता है. इसका एक सीधा जवाब तो ये हो सकता है कि कांग्रेस की राजनीतिक औकात इतनी कम हो गई है कि उसके पास ऑफर करने के लिये ज्यादा कुछ नहीं है. वो मीडिया से भी लड़ रही है, सरकार की एजेंसियों से भी और आज की तारीख में बीजेपी जैसे एक विराट संगठन से भी लेकिन सच सिर्फ इतना नहीं है. हकीकत ये भी है कि हर संगठन में पीढ़ी परिवर्तन का वक्त आता है और उसे आईरन हैंड से अंजाम देना होता है. बीजेपी में जब ये परिवर्तन हुआ तो हलके फुलके झटके वहां भी आये थे लेकिन आरएसएस के प्रभाव ने उसको न्यूट्रल कर दिया. 125 साल पुरानी पार्टी ऐसा क्यों नहीं कर पा रही. ये तो ये तय हो कि पुरानी पीढ़ी जब तक सक्रिय है तो तक उसके साथ डट कर खड़ी रहेगी, अगर नहीं तो नई पीढ़ी के लिये जगह बनाएगी.

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आपसी झगड़ों में उलझी कांग्रेस

राजस्थान में गहलोत और पायलट का झगड़ा था. ऐसा लगा कि पार्टी किसी के साथ नहीं है. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टी एस सिंह देव की लड़ाई अनिर्णायक रही. मध्यप्रदेश में लगा कमलनाथ बेलगाम हैं और पीछे जाईये पंजाब में कांग्रेस के धुरंधर अमरिंदर सिंह और नवजोत सिद्धु के झगड़े में चरणजीत सिंह की लॉटरी तो लगी लेकिन तब तक लुटिया डूब चुकी थी. अभी बिहार के चुनाव देख लीजिये. 61 सीटों में कांग्रेस सिर्फ 6 जीती, सवाल सिर्फ इतना नहीं है. सवाल ये है कि क्लैरिटी नहीं थी कि तेजस्वी का पिछलग्गू बनना है कि नहीं. जरूरत है कांग्रेस अपने आप को रिइनवेंट करे. फैसले डेसाइसिव हों. हाईकमान सच में हाईकमान की तरह दिखे. 24/7 राजनीति करने का माद्दा पैदा किया जाये. कांग्रेस जब तक लंबी लड़ाई की रूपरेखा तैयार नहीं करती, तब तक ऐसे शॉर्ट टर्म फैसले करती रहेगी और इन शॉर्ट टर्म फैसलों से लॉन्ग टर्म राजनीति में ऐसे व्यवधान आते रहेंगे.

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