हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को डुबोए जाने के बाद पैदा हुए तनाव के बीच भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘रायसीना डायलॉग 2026’ में कहा कि भारत ने एक अन्य ईरानी जहाज, IRIS लावन को कोच्चि बंदरगाह पर डॉक करने की अनुमति पूरी तरह से ‘मानवीय आधार’ पर दी थी. इसके साथ ही उन्होंने हिंद महासागर में विदेशी मिलिट्री की लंबे समय से मौजूदगी की ओर इशारा किया.
जयशंकर ने कहा, ‘हमें ईरानी पक्ष से एक मैसेज मिला कि उनका एक जहाज जो शायद उस समय हमारी सीमा के सबसे करीब था, हमारे बंदरगाह में आना चाहता था. वे रिपोर्ट कर रहे थे कि उनकी जहाज में कोई समस्या हुई है. फिर हमने एक मार्च को उस जहाज को आने की मंजूरी दे दी और उन्हें आने में कुछ दिन लगे और फिर वे कोच्चि में डॉक हुए.’
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तीसरा जहाज, IRIS बुशहर, श्रीलंकाई जलक्षेत्र के बाहर इंजन की खराबी की सूचना दी और सहायता मांगी, जिसके बाद श्रीलंका ने उसे डॉक करने की अनुमति दी.
विदेश मंत्री का यह बयान ईरान नेवी के उन तीन जहाजों के संदर्भ में आया है, जो ईरान, अमेरिका और इजरायल के जंग के बीच फंस गए. ये जहाज – IRIS डेना, IRIS लावन और IRIS बुशहर – हिंद महासागर में थे और फरवरी के अंत में विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना की ओर से आयोजित ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ और ‘मिलन 2026’ अभ्यास में भाग लिया था.
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जयशंकर ने आगे कहा, ‘निश्चित रूप से श्रीलंका में भी ऐसी ही स्थिति थी, उन्होंने वह फैसला लिया जो उन्हें लेना चाहिए था. दुर्भाग्य से एक जहाज बच नहीं पाया. हमने कानूनी मुद्दों के अलावा मानवीय दृष्टिकोण से स्थिति को देखा और मुझे लगता है कि हमने सही काम किया.’
उन्होंने डिएगो गार्सिया, जिबूती और हंबनटोटा जैसे विदेशी सैन्य अड्डों का जिक्र करते हुए संकेत दिया कि यह क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक सैन्य शक्तियों की मौजूदगी का गवाह रहा है. विदेश मंत्री ने कहा, ‘इसे लेकर सोशल मीडिया पर काफी बहस चल रही है. कृपया हिंद महासागर की वास्तविकता को समझें. डिएगो गार्सिया पिछले पांच दशकों से हिंद महासागर में है. तथ्य यह है कि जिबूती में विदेशी ताकतें तैनात हैं, यह इस सदी के शुरुआती पहले दशक में हुआ था. हंबनटोटा इसी अवधि के दौरान सामने आया.’
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डिएगो गार्सिया चागोस द्वीपसमूह जहां 1970 के दशक की शुरुआत से एक संयुक्त यूके-यूएस सैन्य अड्डा है. यह बेस एयर
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