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देखिए रवींद्रनाथ टैगोर के हाथ से लिखी राष्ट्रगान की लिपि, नोबेल पैनल ने की शेयर

Rabindranath Tagor: स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस इन दोनों ही दिनों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का जिक्र होता है। ये किसने लिखा, कब लिखा और सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल कि किसके लिए लिखा गया? आज इस सब से हटकर आपको दिखाएंगे कि रवींद्रनाथ टैगोर की हेंडराइटिंग में ये कैसा दिखता है।

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Rabindranath Tagor: भारत में आज स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, हर किसी ने भारत को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बधाईयां दी। लेकिन इस दौरान एक बहुत ही खास बधाई सामने आई जिसमें रवींद्रनाथ टैगोर को याद किया गया। 78वां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नोबेल पुरस्कार पेज ने राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की हस्तलिखित अंग्रेजी लिपि को एक्स पर अंग्रेजी अनुवाद को शेयर किया है। ये भारत के इतिहास की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है।

‘जन गण मन’ का अंग्रेजी अनुवाद

‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जिसे मूल रूप से बंगाली में कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, जिन्हें 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. आज एक बार फिर से उनके लिखे जन गण मन का अंग्रेजी अनुवाद नोबेल पुरस्कार के पेज से शेयर किया गया है। इसको शेयर करते हुए लिखा गया कि “जन गण मन” भारत का राष्ट्रीय गान है, जो मूल रूप से बंगाली में कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचा गया था, जिन्हें 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।”

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क्या है इसका इतिहास

शब्दों के खेल में रवींद्रनाथ टैगोर को कोई टक्कर नहीं दे सकता है। मूल रूप से दिसंबर 1911 में बंगाली में ‘भरोतो भाग्यो बिधाता’ के रूप में रचित इस गीत के पहले छंद को जनवरी 1950 में भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया था।


‘भरोतो भाग्यो बिधाता’ का अंग्रेजी नाम ‘द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया’ था जैसा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के हाथ से लिखे अनुवाद में देखा गया है। इस बीच, ‘जन गण मन’ का अनुवाद ‘आप सभी लोगों के मन के शासक हैं’ के रूप में किया गया।

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सुबह 11.42 बजे नोबेल पुरस्कार के एक्स पर पोस्ट किए जाने के बाद से ट्वीट को लगभग 1 लाख 66 हजार लोगों ने देखा है। रिपोर्ट लिखे जाने तक इसे 1200 बार रीट्वीट किया गया और करीब 5000 यूजर्स ने लाइक किया।

रवीन्द्रनाथ टैगोर एक कवि, गीतकार, लेखक, चित्रकार, नाटककार, संगीतकार, दार्शनिक और समाज सुधारक थे जिन्होंने बंगाली साहित्य और संगीत को नया रूप दिया। उन्हें 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसने उन्हें प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपीय और पहले गीतकार बना दिया।

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