केंद्र सरकार ने देश में रिन्यूएबल एनर्जी से बनने वाली बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने के लिए PM-DHARA योजना को मंजूरी दी है. इस योजना पर कुल 1.86 लाख करोड़ खर्च किए जाएंगे. इसके तहत राज्यों में ग्रीन एनर्जी के लिए नया ट्रांसमिशन नेटवर्क तैयार करने के साथ 135 गीगावाट तक रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से जोड़ने की क्षमता विकसित की जाएगी. साथ ही 50 गीगावाट-घंटे (GWh) बैटरी एनर्जी स्टोरेज की व्यवस्था भी की जाएगी. PM-DHARA का मकसद ज्यादा ग्रीन बिजली बनाने पर, उसे स्टोर करने और सही जगह तक पहुंचाने के लिए मजबूत नेटवर्क तैयार करने पर है.
क्या है PM-DHARA योजना?
PM-DHARA का पूरा नाम PM-Developing Harmonized and Accelerated Renewable-energy Access है. इस योजना के तहत 135 गीगावाट तक रिन्यूएबल एनर्जी की बिजली निकालने और ट्रांसमिट करने की क्षमता तैयार की जाएगी. इस योजना की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि सोलर और विंड पावर हर समय एक जैसी नहीं मिलती.सूरज न होने पर सोलर बिजली का उत्पादन घट जाता है और हवा की रफ्तार कम होने पर विंड पावर भी प्रभावित होती है.इसके अलावा ट्रांसमिशन लाइन की कमी से कई बार तैयार बिजली को पूरी तरह इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है.
1.86 लाख करोड़ कहां खर्च होंगे?
PM-DHARA का कुल बजट 1,86,405 करोड़ है.इसमें 1,36,378 करोड़ ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-3 के तहत राज्यों के अंदर ट्रांसमिशन सिस्टम विकसित करने के लिए रखे गए हैं.वहीं 50,000 करोड़ से 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम यानी BESS लगाया जाएगा.केंद्र सरकार की ओर से कुल 54,082 करोड़ की वित्तीय सहायता दी जाएगी.बैटरी स्टोरेज का फायदा यह होगा कि जब सोलर बिजली उपलब्ध नहीं होगी या बिजली की मांग अचानक बढ़ेगी, तब स्टोर की गई ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकेगा.इससे ग्रिड पर दबाव कम करने और बिजली की सप्लाई को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकेगी है.
राज्यों और बिजली कंपनियों की क्या भूमिका होगी?
इस योजना को लागू करने में राज्यों की स्टेट ट्रांसमिशन यूटिलिटीज यानी STUs मुख्य एजेंसियां होंगी.नई ट्रांसमिशन परियोजनाएं टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग यानी TBCB के जरिए लागू की जाएंगी.वहीं मौजूदा नेटवर्क को मजबूत और अपग्रेड करने का काम कॉस्ट-प्लस बेसिस पर किया जाएगा.
आम बिजली उपभोक्ता को क्या फायदा होगा?
PM-DHARA का असर सिर्फ पावर कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा.केंद्र की वित्तीय सहायता से राज्यों पर ट्रांसमिशन का खर्च कम करने में मदद मिलेगी, जिसका फायदा आगे चलकर बिजली की लागत पर भी पड़ सकता है.इसके साथ ही बेहतर ट्रांसमिशन नेटवर्क से रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड में शामिल करना आसान होगा. यह योजना वित्त वर्ष 2032-33 तक लागू की जानी है.इसके जरिए भारत के लंबे समय के नॉन-फॉसिल ऊर्जा लक्ष्यों को भी सपोर्ट मिलेगा.साथ ही ट्रांसमिशन, निर्माण, बैटरी स्टोरेज और पावर सेक्टर में रोजगार के मिलने की भी उम्मीद है.
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