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निशिकांत दुबे के साथ एक और बीजेपी नेता की बढ़ीं मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट के वकील ने अटॉर्नी जनरल से मांगी मंजूरी

सांसद निशिकांत दुबे और विधायक अग्निमित्रा पॉल को सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाना भारी पड़ता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वकील ने अटॉनी जनरल को चिट्ठी लिखी और अवमानना की कार्रवाई के लिए मंजूरी मांगी।

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सांसद निशिकांत दुबे के साथ एक और बीजेपी अग्निमित्रा पॉल की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अग्निमित्रा पॉल पश्चिम बंगाल से भाजपा विधायक हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और विधायक अग्निमित्रा पाल के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई के लिए मंजूरी मांगी। दोनों नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और आमजन के विश्वास को ठेस पहुंचाने का आरोप है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखा और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने के लिए मंजूरी मांगी। साथ ही वकील ब्रजेश सिंह ने पश्चिम बंगाल से बीजेपी विधायक अग्निमित्रा पॉल के खिलाफ भी अवमानना की कार्रवाई चलाने की मांग की है।

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जानें निशिकांत दुबे-अग्निमित्रा पॉल ने क्या कहा था?

आपको बता दें कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर अदालत को ही कानून बनाना है तो संसद को बंद कर देना चाहिए। साथ ही उन्होंने देश में सिविल वॉर के लिए सीजेआई संजीव खन्ना को जिम्मेदार बताया। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी ने खुद को निशिकांत दुबे के बयान को अलग कर लिया। विधायक अग्निमित्रा पॉल ने निशिकांत दुबे के बयान का सपोर्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रपति देश के सीजेआई की नियुक्ति करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कैसे राष्ट्रपति के आदेश को नकार सकते हैं?

निशिकांत दुबे पर क्या बोले वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल?

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट पर की गई टिप्पणी पर वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है… अगर ऐसे कद के सांसद जो कानून निर्माता हैं, वे इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान देते हैं, तो इससे न्यायपालिका की गरिमा कम होगी। इससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध खराब होंगे। हालांकि, हमारी न्यायपालिका उस बयान की परवाह नहीं करती, लेकिन भारतीय न्यायपालिका कानून के अनुसार आदेश पारित करती है। यह अदालत की अवमानना ​​हो सकती है, लेकिन हमारी अदालतें बहुत उदार हैं और वे ऐसी चीजों का संज्ञान नहीं लेतीं।

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