उत्तर भारत के छह राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे जल बंटवारे और वित्तीय हिस्सेदारी से जुड़े विवाद को सुलझाने की दिशा में बड़ी कामयाबी मिली है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में मंगलवार को किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच समझौता हो गया. केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में राज्यों ने परियोजना को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई. करीब 15 हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना कई वर्षों से वित्तीय आपत्तियों और राज्यों के बीच सहमति नहीं बनने के कारण अटकी हुई थी. खासतौर पर हिमाचल प्रदेश की ओर से परियोजना के वित्तीय बोझ को लेकर आपत्ति जताई जाती रही थी.
केंद्र के नए फॉर्मूले से दूर हुई बड़ी अड़चन
किशाऊ परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की पहल के बाद नया वित्तीय फॉर्मूला तैयार किया गया है. इसके तहत परियोजना के जल घटक की 90 फीसदी लागत केंद्र सरकार ग्रांट के रूप में वहन करेगी, जबकि शेष 10 फीसदी राशि लाभार्थी राज्यों द्वारा साझा की जाएगी. वहीं हिमाचल प्रदेश पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े, इसके लिए बिजली घटक की लागत दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे उपभोक्ता राज्यों द्वारा उठाने की व्यवस्था की गई है. इसके बदले इन राज्यों को पानी के अतिरिक्त अधिकार दिए जाएंगे.
236 मीटर ऊंचा होगा बांध
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर बनाई जाएगी. टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है. परियोजना के तहत 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा. निर्माण पूरा होने के बाद यह टिहरी बांध के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध होगा.
660 मेगावॉट हरित ऊर्जा का होगा उत्पादन
किशाऊ बांध से करीब 660 मेगावॉट हरित ऊर्जा क्षमता विकसित होगी. परियोजना से हर साल लगभग 1,379 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होने का अनुमान है. उत्पादित बिजली उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच समान रूप से बांटी जाएगी. परियोजना की जल भंडारण क्षमता करीब 1,324 मिलियन घन मीटर होगी.
97 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन को मिलेगा सिंचाई का पानी
किशाऊ परियोजना का एक बड़ा उद्देश्य उत्तर भारत में सिंचाई और पेयजल की जरूरतों को पूरा करना है. परियोजना के जलाशय से 97 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने की योजना है. इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर और पड़ोसी राज्यों को पेयजल आपूर्ति में भी इसका बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है.
यूपी के लिए क्यों अहम है समझौता?
छह राज्यों के समझौते में उत्तर प्रदेश भी प्रमुख लाभार्थी राज्यों में शामिल है. यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता और जल संरक्षण बढ़ने से उत्तर प्रदेश के यमुना से जुड़े क्षेत्रों को पेयजल और सिंचाई के मोर्चे पर फायदा मिलने की उम्मीद है. किशाऊ परियोजना के आगे बढ़ने से उत्तर भारत में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ सिंचाई, पेयजल और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आने की संभावना है.
कुल मिलाकर, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुआ यह समझौता कई वर्षों से लंबित किशाऊ परियोजना को जमीन पर उतारने की दिशा में अहम पड़ाव माना जा रहा है. साथ ही यह केंद्र और राज्यों के बीच सहमति के जरिए पुराने जल विवादों को सुलझाने की केंद्र सरकार की कोशिशों में एक और महत्वपूर्ण कदम है.
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