सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस अभय एस ओका ने कहा कि हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से काम करते हैं। हाईकोर्ट कमेटियों के जरिए काम करते हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट CJI केंद्रित कोर्ट है। इसमें बदलाव की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले दो सप्ताह मेरे लिए बहुत मुश्किल भरे रहे, क्योंकि कई फैसले लिखने थे।
उन्होंने कहा कि कई लोगों ने मुझसे पूछा कि जब मैं पद छोड़ता हूं तो कैसा लगता है? जजों को न्याय करने की स्वतंत्रता होती है और जब आप जज नहीं होते तो आपको वह स्वतंत्रता नहीं मिलती। 21 साल और 9 महीने के काल में मैं 3 संवैधानिक न्यायालयों का न्यायाधीश रहा। न्यायालय का पद जीवन बन जाता है और जीवन ही न्यायालय बन जाता है। शायद कुछ दिनों के बाद मैं अपने भविष्य के अगले कदम के बारे में तर्कसंगत रूप से सोच सकूं।
न्यायपालिका में शामिल होने से संतुष्टि
जस्टिस अभय एस ओका ने कहा कि जब कोई सफल वकील जज बनता है तो कहते हैं कि व्यक्ति त्याग करता है। मैं इसे स्वीकार नहीं करता। जब आप न्यायपालिका में शामिल होते हैं, तो आपको वो इनकम तो नहीं मिल सकती लेकिन आपको जो काम से संतुष्टि मिलती है, उसकी तुलना वकील के इनकम से नहीं की जा सकती। एक बार जब आप जज बन जाते हैं तो केवल संविधान और विवेक ही आपको नियंत्रित करते हैं।
जस्टिस ओका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की अनदेखी की है, हमारे ट्रायल और जिला न्यायालयों में बहुत ज्यादा मामले लंबित हैं। ट्रायल और जिला न्यायालयों में लंबित मामलों को निपटाने के लिए एक समिति बनाई गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और दीपांकर दत्ता इस समिति के सदस्य हैं। ट्रायल कोर्ट को कभी भी अधीनस्थ न्यायालय न कहें। यह संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। 25 सालों से अपीलें लंबित हैं। इलाहाबाद जैसी अदालतें आधी संख्या में काम कर रही हैं। 20 साल बाद किसी को सजा देना मुश्किल भरा काम है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां हमें काम करना है। हमें ट्रायल कोर्ट और आम आदमी के बारे में भी सोचना चाहिए।
हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से करते हैं काम
उन्होंने कहा कि मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से काम करते हैं। हाईकोर्ट कमेटियों के जरिए काम करते हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट CJI केंद्रित कोर्ट है। इसमें बदलाव की जरूरत है। आप नए CJI के साथ यह बदलाव देखेंगे। मामलों में ऑटो लिस्टिंग सिस्टम की जरूरत है, हाईकोर्ट में एक निश्चित रोस्टर होता है। इसमे चीफ जस्टिस को भी विवेकाधिकार नहीं मिलता। जब तक हम मैन्युअल इन्टरफेरेंस को कम कम नहीं कर देते, तब तक हम बेहतर लिस्टिंग नहीं कर सकते। लिस्टिंग तर्कसंगत होनी चाहिए।
इस मौके पर बोलते हुए SCBA के पूर्व प्रेसिडेंट कपिल सिब्बल ने कहा कि जस्टिस ओका ने देश के महान न्यायाधीशों में अपना स्थान बनाया है। उनको उनकी स्पष्टवादिता और पारदर्शिता के लिए याद किया जाएगा। जब सुप्रीम कोर्ट का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें एक चैप्टर ग्रैंड ओका पर होगा। SCBA के नवनिर्वाचित प्रेसिडेंट विकास सिंह कहा कि जस्टिस ओका का देखते हुए मैं कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट के जज के रिटायरमेंट की उम्र 65 साल नहीं होनी चाहिए। यह विद्वता और प्रतिभा की बर्बादी है।
संबंधित खबरें
SIR विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार की बढ़ीं मुश्किलें, फिर खुली 20 साल पुरानी विजिलेंस फाइल
29 mins ago'लोकतंत्र को कर रहे हैं बर्बाद', ज्ञानेश कुमार को लेकर राहुल गांधी का बड़ा बयान, 15000 वोटर्स के नाम हटाने का आरोप
3 hrs agoअब कैसी है कैप्टन स्मित मच्छार की तबीयत? UAE की इंडियन एंबेसी ने दिया हेल्थ अपडेट
3 hrs agoस्मिथ मच्छार की बहादुरी ने दिलाई इंडियन नैनी की याद, 9/11 हमले में बचाई थी 2 साल के इजरायली बच्चे की जान
6 hrs agoCEC ज्ञानेश कुमार और SIR विवाद के बीच मुख्य चुनाव अधिकारी ने मांगी VRS, बोले-निजी फैसला
7 hrs agoपेंडिंग हैं चालान तो न बनेगा PUC और न रिन्यू होगा ड्राइविंग लाइसेंस, सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश; ब्लैकलिस्ट होंगी गाड़ियां
10 hrs agoबचपन में कैसे थे कैप्टन स्मित मच्छार, दोस्त ने याद किए पुराने दिन; पड़ोसियों ने बताए परिवार के हाल
10 hrs ago'आसमान में आपको कौन बचाएगा?', Flydubai के पायलट स्मित मच्छार का पुराना VIDEO हो रहा वायरल
11 hrs agoफॉर्म-6 में चेंज का आदेश किसने दिया? राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से पूछा सवाल
11 hrs ago'INDIA' महाबैठक में सोनिया गांधी की एंट्री ने क्यों चौंकाया? हॉल में कैसे मची अफरातफरी
12 hrs agoन्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
First published on:
Know More: Editorial Guidelines