जब भी सुनामी का जिक्र होता है तो दिसंबर, 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी की दर्दनाक तस्वीरें आंखों के सामने घूमने लगती हैं. 22 साल पहले आई सुनामी ने भारत, श्रीलंका और इंडोनेशिया के तटीय इलाकों में भयानक तबाही मचाई. समुद्र में भूकंप आने से लगातार तटीय इलाकों में सुनामी का खतरा बना रहता है. इस आपदा से तैयारी के लिए अब समुद्र के किनारे स्थित गांवों को आपदा से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है. ओडिशा के तटीय इलाकों में आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि सामने आई है.
सुनामी के लिए तैयार ओडिशा के 100 गांव
आपको बता दें कि सोमवार को ओडिशा के 74 और तटीय गांवों को यूनेस्को-आईओसी के ‘सुनामी के लिए तैयार’ कार्यक्रम के तहत मान्यता दी गई है. इसके साथ ही ओडिशा में इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त गांवों की संख्या बढ़कर 100 हो गई है. अधिकारियों ने सोमवार को इसकी जानकारी दी. यह मान्यता नेशनल सुनामी रेडी बोर्ड (NTRB) और ओडिशा सरकार के बीच हुई बैठक के दौरान प्रदान की गई.
100 गांवों को किस आधार पर मिली मान्यता?
इससे पहले संबंधित गांवों में तैयारियों का क्षेत्रीय स्तर पर वेरिफाइड किया गया था. इस प्रक्रिया की शुरुआत बालासोर, भद्रक, केंद्रापड़ा, पुरी और जगतसिंहपुर जिलों के तटीय क्षेत्रों में की गई. ‘सुनामी के लिए तैयार’ कार्यक्रम का उद्देश्य केवल किसी गांव को प्रमाणित करना नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों और स्थानीय प्रशासन को संभावित सुनामी जैसी आपदा से निपटने के लिए तैयार करना है. इसके तहत समुदाय स्तर पर जागरूकता, चेतावनी प्रणाली, निकासी योजना और आपात स्थिति में समन्वय जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया जाता है.
बैठक की अध्यक्षता भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) के निदेशक बालकृष्णन नायर और ओडिशा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (OSDMA) के प्रबंध निदेशक राजेश प्रभाकर पाटिल ने की.
381 तटीय गांवों की पहचान
अधिकारियों के मुताबिक, ओडिशा सरकार ने राज्य में सुनामी के संभावित खतरे वाले 381 तटीय गांवों और बस्तियों की पहचान की है. इन सभी क्षेत्रों को बारी-बारी से आपदा के लिए तैयार करने का टार्गेट रखा गया है. सरकार का फोकस तटीय आबादी को समय रहते चेतावनी मिलने, सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने और आपात स्थिति में स्थानीय स्तर पर प्रभावी प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ाने पर है. ओडिशा का लंबा समुद्री तट होने के कारण राज्य के कई इलाके समुद्री आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं. ऐसे में स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन व्यवस्था से जोड़ना महत्वपूर्ण माना जा रहा है.