भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर छिड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. अब एक नया खुलासा हुआ है, जिसने देश की सियासत में हड़कंप मचा दिया है और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया भी व्यक्त की है. दरअसल, केरलम के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने कहा कि ज्ञानेश कुमार ने साल 2016 में उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव का टिकट भाजपा की ओर से ऑफर किया था. हाल ही में चुनाव आयोग से संबंधित एक रिपोर्ट रिलीज होने के बाद ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं और अब थॉमसन के दावे ने मुसीबतें बढ़ा दी हैं.
थॉमसन और ज्ञानेश कुमार के बीच से बातें हुईं
जिजी थॉमसन ने बताया कि वह और ज्ञानेश कुमार एक फ्लाइट में सफर कर रहे थे. इस दौरान उनसे बातचीत हुई और दोनों प्रधानमंत्री मोदी के बारे बातें कर रहे थे. इस दौरान ज्ञानेश कुमार ने पूछा कि क्या मैं चुनाव लड़ने की इच्छा रखता हूं? क्या मेरी दिलचस्पी साल 2019 का लोकसभा चुनाव केरलम के पठानमथिट्टा से भाजपा कैंडिडेट के तौर पर लड़ने की है? उनके सवालों का जवाब देते हुए मैंने इनकार कर दिया. लेकिन ज्ञानेश कुमार ने कहा कि चुनाव लड़ोगे और जीतोगे तो केंद्रीय मंत्री बन सकते हो. लेकिन मैंने उनका ऑफर ठुकरा दिया और कहा कि मुझे चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं है.
थॉमसन के दावे पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया
बता दें कि थॉमसन के दावे पर नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के जरिए ही चुनावी मैच फिक्सिंग कराते हैं. दोनों ने पहले उनके जरिए पार्टी में भर्तियां की और फिर उनसे चुनावों में ‘मैच फिक्सिंग’ कराई. जब ज्ञानेश कुमार IAS अफसर थे, तब उन्हें भाजपा में लोग भर्ती कराए और फिर उन्हें अंपायर बनाकर चुनावों की मैच फिक्सिंग कराई. केरल कांग्रेस ने कहा कि एक IAS अफसर को, ज्ञानेश कुमार को भाजपा के चुनाव टिकट बांटने का अधिकार किसने दिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त पर क्यों छिड़ा है विवाद?
बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच उन्होंने फॉर्म-6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलावों समेत 14 मामलों में 14 बार लिखित आपत्तियां और असहमति दर्ज कराईं, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही संज्ञान लिया. मतदाता सूचियों के काम को भी सीधे दिल्ली ऑफिस को सौंपने पर आपत्ति जताई थी, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा. कई मामलों में न उनकी राय ली गई और न ही उनकी सहमति की परवाह की गई.