CAA से जुड़ी 200 से ज्यादा याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Supreme Court

Supreme Court

विज्ञापन

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित और न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट की पीठ नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 को चुनौती देने वाली कम से कम 220 याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

सीएए के खिलाफ याचिकाओं पर सबसे पहले 18 दिसंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। इस पर आखिरी बार 15 जून, 2021 को सुनवाई हुई। सीएए को 11 दिसंबर, 2019 को संसद ने पारित किया था, जिसके बाद देश के कई हिस्सों में इसका विरोध हुआ था। सीएए 10 जनवरी, 2020 को लागू हुआ।

Advertisment

याचिका देने वालों में केरल स्थित एक राजनीतिक दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता देवव्रत सैकिया, गैर सरकारी संगठन रिहाई मंच और सिटिजन्स अगेंस्ट हेट, असम एडवोकेट्स एसोसिएशन और कानून के छात्र कई अन्य लोगों में शामिल हैं। 2020 में, केरल सुप्रीम कोर्ट में सीएए को चुनौती देने वाला पहला राज्य बना था।

यह कानून उन हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता देने की प्रक्रिया को तेज करता है, जिन्होंने धार्मिक उत्पीड़न से तंग आकर अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान छोड़ दिया और 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में शरण ली।

शीर्ष अदालत ने पहले केंद्र को नोटिस जारी किया था और केंद्र को सुने बिना कानून पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था। मार्च 2020 में, केंद्र ने शीर्ष अदालत के समक्ष अपना हलफनामा दायर करते हुए कहा कि सीएए अधिनियम एक “सौम्य कानून” है जो किसी भी भारतीय नागरिक के “कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों” को प्रभावित नहीं करता है।

विज्ञापन

साथ ही केंद्र ने कानून को कानूनी बताते हुए कहा था कि सीएए किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है,  संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करने का कोई सवाल ही नहीं था। याचिकाओं में तर्क दिया गया कि अधिनियम, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने में तेजी लाता है और धर्म आधारित भेदभाव को बढ़ावा देता है।

संशोधनों को धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), 15 (धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) और 19 (स्वतंत्रता के अधिकार) सहित कई अन्य आधारों पर भी चुनौती दी गई है।

विज्ञापन

कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम संविधान के तहत परिकल्पित मूल मौलिक अधिकारों पर एक “बेरहम हमला” है और “बराबर को असमान” मानता है। 2019 अधिनियम ने नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन किया, जो अवैध प्रवासियों को नागरिकता के योग्य बनाता है यदि वे (ए) हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदायों से संबंधित हैं, और (बी) अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से हैं।
यह केवल 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश करने वाले प्रवासियों पर लागू होता है। संशोधन के अनुसार, पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को प्रावधान से छूट दी गई है।

विज्ञापन

Get Breaking News First and Latest Updates from India and around the world on News24. Follow News24 on Facebook, Twitter.

First published on:

Read more: About our editorial guidelines and standards here.

लेख समाप्त

लेखक के बारे में

विज्ञापन
होम पेज पर वापस जाएँ